शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

फोटोग्राफी क्लासरूम - ज़ूम लेंस का परिचय


सबसे पहले तो इस अध्याय की कई दिनों से प्रतीक्षा कर रहे मित्रों से क्षमा याचना करना चाहूंगा। कुछ व्यस्ततायें घेरे रहीं, जिनके कारण कुछ लिख नहीं पा रहा था।

  
 
आपको पिछले आलेख में मैने बताया था कि कैमरे के दो कार्य हैं -  १) किसी दृश्य को व्यू फाइंडर पर दिखाना  २) उस दृश्य को, यदि हम चाहें तो स्थाई रूप से किसी न किसी मीडिया पर अंकित कर देना ।   
 
कैमरा किसी दृश्य को अच्छी प्रकार से व्यू फाइंडर में दिखा पाये, यह मूलतः कैमरे की लेंस की क्वालिटी पर निर्भर 
करता है।  लेंस के डायमीटर का सीधा संबंध लेन्स की क्वालिटी से है - यह आप जान चुके हैं । अब आगे...
 
ज़ूम लेंस  (Zoom Lens)
 
आइये, ज़ूम लेंस (Zoom lens) के बारे में कुछ चर्चा की जाये।  कुछ वर्ष पहले तक कैमरों मे फिक्स फोकल लेंथ लेंस Fixed focal length lens हुआ करते थे। वह एक निश्चित कोण तक का एरिया कवर कर सकते थे।  (Those covered area upto a certain viewing angle.)  मान लीजिये आप अपने कमरे में परिवार के दस सदस्यों का group photo खींचना चाहते हैं तो आप उनको अपने से इतनी दूर खड़ा करते थे कि कैमरे के  view finder में सबके सब दिखाई देने लगें। यदि कमरे की दीवार से सट कर भी सब लोग कैमरे में दिखाई नहीं देते थे तो आप को कमरे से बाहर आंगन में आकर फोटो खींचनी होती थी या लेंस बदल कर wide angle lens लगानी होती थी ताकि वह ज्यादा एरिया कवर कर सके।  
 
दूसरी ओर, यदि आपको अपनी प्रेमिका की झील सी गहरी आंखों का  close up चाहिये होता था तो आप फोटो खींचने के लिये उससे बिल्कुल सट कर खड़े होते थे ताकि आपका कैमरा आपकी प्रेमिका की आंखों से दो-चार इंच दूर आ जाये।  उन दिनों,   लेंस तीन श्रेणियों में विभाजित होती थीं: 
 
* वाइड एंगिल लेंस  (ज्यादा बड़ा कोण बनता है इसलिये ज्यादा बड़ा एरिया कवर होता है)  
Wide Angle lens (It has bigger angle of view therefore covers wider area in front of it).

* टेलि लेंस (टेली अर्थात ’टेलिस्कोपिक’ -  दूर की वस्तुओं को नज़दीक ले आती है) 
Tele i.e. telescopic lens has a narrow angle of view,  can bring distant objects optically close to you just like a binocular or a telescope.  

* नॉर्मल (हमारी आंख के जितना ही एंगिल बनाती है अतः नॉर्मल कहलाती है।)
 
 Has got an angle of view quite similar to the viewing angle of human eye ( average 43 degree)  Gives a 'normal' appearance to our picture.  Objects appear in the picture as they appear to us visually.
 
वाईड एंगिल लेंस का उपयोग सीनरी, लैंडस्केप या ग्रुप (scenary, landscape or group photographs आदि 
के लिये होता है। यदि फोटोग्राफर के लिये पीछे हटने को स्थान न हो, अपनी फोटो में सब कुछ शामिल कर लेने की इच्छा हो तो यह लेंस बहुत काम की है। उदाहरण के लिये आप 50 mm lens  के बजाय 25 mm lens लगा कर angle of view दुगना कर देते हैं।     
 
टेलि लेंस जंगल में शेर-चीतों की फोटो wild life photography  के शौकीन या स्पोर्ट्स की फोटोग्राफी sports photography करने वाले प्रोफेशनल खरीदा करते थे।
 
 
कुछ ऐसे भी लोग थे जो किसी की फोटो खींचना तो बहुत चाहते थे, पर पास जाकर फोटो खींचने का साहस नहीं कर पाते थे।  ऐसे लोगों के लिये भी ये लेंस सहारा बन जाती है।  टेलि लेंस लगा कर दूर से ही निहारते रहो और चाहो तो फोटो भी खींच कर खुश हो जाओ! 
Stolen images may be captured with the help of telescopic lens.    
 
नॉर्मल लेंस वह लेंस था जो अक्सर कैमरे पर लगा हुआ आता था।  हम अपनी आंख से किसी वस्तु को जितनी दूर देखते हैं, नॉर्मल लेंस उतनी ही दूर दिखाता था।  
 
35 mm. cameras  सर्वाधिक लोकप्रिय कैमरे रहे हैं। अतः उसको ही स्टॅण्डर्ड मान कर चलते हैं।  इस दृष्टि से देखें तो 45 mm. से 55 mm. focal length रेंज हो तो लेंस नॉर्मल कहलाएगी।  45 mm से कम फोकल लेंथ (focal length)  हो तो लेंस वाईड एंगिल लेंस (wide angle lens)  मानी जायेगी।   55 mm. से अधिक focal length वाली लेंस टेलीलेंस मानी जाती हैं। 

100 mm.  की लेंस 50 mm की लेंस की तुलना में दुगना बड़ा चित्र बनायेगी मगर कवरेज छोटे कोण narrower angle पर होगी।  देखें संलग्न चित्र।       
 
यद्यपि ज़ूम लेंस में एक रिंग घुमाने मात्र से आप एक ही स्थान पर खड़े-खड़े दृश्य को अपने से दूर या पास कर सकते हैं पर कुछ वर्ष पहले तक (१० या पंद्रह वर्ष) ज़ूम लेंस महंगे भी थे और उनकी क्वालिटी भी संतोषजनक नहीं मानी जाती थी ।  इसलिये प्रोफेशनल फोटोग्राफर तो अपने बैग में तीन-चार लेंस लेकर घूमा करते थे।  जो इस विधा के प्रति बहुत समर्पित थे ऐसे फोटोग्राफर गले में तीन कैमरे भी लटकाये हुए दिखाई दे जाते थे।  (जितनी देर में लेंस बदलेंगे, उतनी देर में कहीं कोई अद्भुत दृश्य आंखों से ओझल न हो जाये) ।  एस. एल. आर. कैमरे का मुख्य आकर्षण भी यही था कि उसमें आप वाईड, नॉर्मल या टेली -(wide, normal or tele lens) कोई सा भी लेंस लगा सकते थे। पर जैसे-जैसे लेंस निर्माण तकनीक में सुधार आये हैं, ज़ूम लेंस की लोकप्रियता दिन दूनी - रात चौगुनी बढ़ती चली जा रही है।  कंपनियां कैमरे के साथ अब नॉर्मल ज़ूम normal zoom lens दे रही हैं।  (35 mm. कैमरे में जो लेंस 28-80 mm रेंज में कार्य करती थी, वही डिजिटल में 18-55 mm. range कहलाती है।  इस लेंस में थोड़ा वाईड (wide)  भी है और थोड़ा टेलि इफेक्ट (telescopic effect)  भी है।  इसलिये इसे सामान्य उपयोग की लेंस (general purpose lens) माना जाता है। 
 
 
कितने X की ज़ूम है? How much is the zoom magnification ?
 
कोई लेंस यदि 18 mm. focal length से शुरू हो कर 55 mm. पर समाप्त होती है तो इसका सीधा सा अर्थ यह है कि 18 mm. सैटिंग पर कोई वस्तु जितनी बड़ी दिखाई देगी, 55 mm. सैटिंग कर देने से वह लगभग तीन गुना बड़े आकार में दिखाई देगी।  इसलिये हम इस लेंस को 3x zoom magnification वाला लेंस कह सकते हैं।  यदि यह लेंस 18-135 mm. रेंज की होती तो हम इसे 7.5 X  zoom lens  कहते।  36-360 mm. रेंज हो तो लेंस 10X ज़ूम है।  आई बात समझ मां ?
 
ऑप्टिकल और डिजिटल ज़ूम Otical v/s. Digital Zoom 
 
कैमरे की लेंस एक कंपाउंड लेंस compound lens होती है जिसको खोल कर देखें तो ६ से लेकर १६ तक ग्लास एलिमॅंट (glass elements may be anywhere between 6 and 16) उसमे हो सकते हैं।  फिक्स्ड फोकल लेंथ लेंस Fixed Focal length lens में इन सब ग्लास एलिमेंट्स का स्थान (positioning of each glass element) निश्चित है पर ज़ूम लेंस में ज़ूम रिंग घुमाने से इनमे से कुछ ग्लास एलिमेंट्स एक दूसरे के नज़दीक या दूर हो जाते हैं (some glass elements move farther or nearer to other when we turn the zoom control)  और  उनके स्थान परिवर्तन से इमेज का आकार बदल जाता है। (This dislocation changes the image size -  making the image bigger or smaller)   यह ऑप्टिकल ज़ूम optical zoom कहलाता है।  डिजिटल ज़ूम digital zoom सिर्फ नज़रों का धोखा है।  डिजिटल ज़ूम digital zoom करने से सिर्फ पिक्सल का आकार बढ़ जाता है (only size of pixel increases) और हमें लगता है कि हम अपने सब्जेक्ट के पास पहुंच गये हैं पर यह काम तो आप कंप्यूटर पर किसी भी पिक्चर को ज़ूम करके कर सकते हैं।  बाज़ार में 450 X  डिजिटल ज़ूम भी देखने को मिल रही हैं - पर उनकी क्वालिटी - भगवान ही रक्षा करे! 
 
जानकार लोगों का कहना है कि 6 X मैग्निफिकेशन तक तो लेंस की पिक्चर क्वालिटी (picture quality of the lens) श्रेष्ठ स्तर पर रहती है पर ग्राहकों को प्रभावित करने के लिये यदि मैग्निफिकेशन 7 X  से ऊपर ले जाया जाता है तो पिक्चर क्वालिटी के मूल्य पर ही ऐसा किया जा सकता है। आखिर लेंस डिज़ायनिंग टेकनीक (Lens designing technology)  की भी अपनी कुछ सीमायें हैं।  
 
अतः मित्रों - फार्मूला न. २ -  6 X से अधिक ज़ूम मैग्निफिकेशन (zoom magnification) से अधिक की लेंस खरीदें तो क्वालिटी के मामले में उस बेचारी से बहुत ज्यादा आशायें मत रखें।  साथ ही, लेंस पर डिजिटल ज़ूम कितनी है - इसकी रत्ती भर भी परवाह न करें।  स्टिल कैमरे में इसका कोई महत्व मेरी दृष्टि में नहीं है। 
 
Sushant Singhal
www.sushantsinghal.blogspot.com
28 Feb. 2009 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

Tree or a torso ?

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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

कौन किसे गाली देरहा है, यह जनता तय करे तो बेहतर !

Blogger sanjaygrover said...ये पाँच लाइन भी लिखने की क्या ज़रुरत भी ? कोई एक पुराना श्लोक ढूंढकर चेप देते। चूंकि वह एक महान ग्रन्थ में से निकला होता, इसलिए उसमें कोई तर्क होता न होता पर उसकी तार्किकता सवयंसिद्ध होती। वैसे तो गालियों की भाषा आपने ही शुरु की है पर आपकी गाली का भी स्वागत करुंगा बशर्ते कि तर्कपूर्ण हो। तर्कहीन बोगस श्लोकों का ज़माना चला गया। ‘‘दुनिया खराब है’’ की वजुहात को सकारण और सतर्क अपने लेखादि में उठाया जाना आपको अराजकता लगती है और पब में लड़कियों को पीटना और ऐसे लोगों को जंगल में भेज देने के आदेश जारी करना ‘‘सामाजिकता’’। तो फिर आप ही बताईए आपका किया क्या जाए ?

February 13, 2009 11:35 AM

Blogger Sushant Singhal said...

सही कहा आपने ! पांच लाइन लिखना भी व्यर्थ ही रहा। आप स्वयं से ही नाराज़ हैं, ख़फा हैं और मैं नासमझ यह सोच - सोच कर दुःखी हो रहा था कि आप मुझसे नाराज़ हो गये हैं !

आपको आपके अभियान के लिये हार्दिक शुभेच्छायें। आपका अभियान क्या है, यह तो मैं समझ नहीं पाया, पर जो भी है - समाज हित की उदात्त भावना से ही होगा ! 

इस अंतहीन बहस को मैं अपनी ओर से यहीं समाप्त मान रहा हूं। बौद्धिक विचार-विमर्श में कड़वाहट के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये! यदि आपको संस्कृत जैसी भाषा से भी इतनी भयंकर एलर्जी है तो फिर कुछ कहने को बाकी ही नहीं रह जाता ! 

सादर नमस्कार

सुशान्त सिंहल

रूढ़ियां तोड़ने के लिये समाज सुधारक की प्रतीक्षा क्यों ?

श्री राम सेना के तथाकथित हिंदू संस्कृतिवादियों ने जो कुछ किया वह सिर्फ संस्कृति के बारे में उनकी अज्ञानता का ही परिचय था । यह बिलकुल सही है की हिंदू संस्कृति के मौलिक स्वरूप में स्त्री पर घर की चाहरदीवारी में छुप कर बैठे रहने की विवशता कभी भी नहीं लादी गई। अपने लिये योग्य जीवनसाथी के चयन की स्वतंत्रता भी पुरुष से अधिक स्त्री को दी जानी चाहिये, ये आदर्श स्वीकार किया गया है। व्यवहार में स्वयंवर की ऐसी परंपराओं का ज्यादा जिक्र नहीं मिलता होगा पर स्वयंवर की प्रथा को सम्मान तो दिया ही गया है।

सच तो ये है कि गुलामी के बहुत लंबे कालखण्ड में, जबकि हिंदू युवतियों को विदेशी आक्रान्ताओं / शासकों की सेनायें जबरन उठा कर ले जाया करती थीं उस समय यह आपद्‌ धर्म बन गया था कि युवा होने से पहले ही लड़की का विवाह कर दो, और जब तक विवाह न हो, तब तक उसे घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगाओ ताकि वह वासना के भूखे सैनिकों की निगाहों से बची रह सके । परंतु इस आपद्‌ धर्म को ही हिंदू संस्कृति का अनिवार्य अंग समझ लेना हास्यास्पद है, अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन मात्र है। अक्सर घर के बड़े बूढ़े अपने बच्चों को कुछ भी ऐसा करते देख कर नाराज़ हो जाया करते हैं, जो उनके जमाने में नहीं हुआ करता था । उनका तकिया - कलाम बन जाता है - "अजी, हमारे जमाने में तो ऐसा ना कभी देखा न सुना ! आज कल के लड़के - लड़कियां तो बस ! तौबा तौबा!!" 

परंतु परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ साथ आपद्‌ धर्म स्वयमेव बदल जाना चाहिये ! इसके लिये यदि किसी समाज सुधारक की प्रतीक्षा करेंगे तो क्या हम सही अर्थों में स्वयं को शिक्षित कहला सकेंगे? 

रूढ़ियों को टूटना ही होता है, टूटना ही चाहिये ! हर अच्छी चीज़ को स्वीकार करना, चाहे वह नई हो या पुरानी - आधुनिकता की निशानी है । बिना सोचे विचारे हर पुरानी प्रथा को जस का तस स्वीकार करते चले जाना रूढ़िवादिता है, कूप-मंढूकता है। हर पुरानी चीज़ को मात्र इस लिये अस्वीकर कर देना, तिरस्कार कर देना क्योंकि वह पुरानी है - यह भी एक नये प्रकार का अंधविश्वास है। हम आधुनिक तब ही माने जायेंगे जब हम हर चीज़ को - चाहे नई हो या पुरानी, तर्कों की, विज्ञान की कसौटी पर कस कर देखें, भली प्रकार जांचें । अच्छी और उपयोगी लगे तो स्वीकार कर लें, अपना लें। यदि बेकार, असामयिक व कालातीत हो चुकी हो तो रद्दी की टोकरी में सरका दें । इसमे झगड़े की गुंजाइश कहां है, मैं समझ पाने में असमर्थ हूं । 

सही तो ये होता कि तथाकथित श्री राम सेना के उन सिरफिरों को पुलिस के हवाले कर दिया जाता और उनको अनावश्यक पब्लिसिटी दी ही न जाती। बहुत सारी हरकतों को करने का मूल उद्देश्य अखबार और टी वी पर अपने आप को देखना / मात्र अपनी टी. आर. पी. बढ़ाना ही होता है। शायद श्रीराम सेना भी पब्लिसिटी के भूखे लोगों का कोई ग्रुप है। दूसरी ओर मीडिया ने भी इन मूर्खों को पब्लिसिटी देकर अपनी टी. आर. पी. बढ़ाने की ही हरकत की है। 

सुशान्त सिंहल

 

Sushant K. Singhal

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

मित्रों, इस बहस में आपकी भी भागीदारी चाहिये !

प्रिय मित्रों,

 

    पिछले कुछ दिनों से मेरे एक ऐसे मित्र से (उनके ब्लॉग के माध्यम से) कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत चल रही है जिनसे व्यक्तिगत परिचय का सौभाग्य मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।

 

    मैं इन मुद्दों पर क्या सोचता हूं, यह तो आपने पढ़ ही चुके हैं पर मेरी एक पोस्ट - "मैं भला क्यों नाराज़ होने लगा" को पढ़ कर, श्री संजय ग्रोवर (मेरे उन मित्र का नाम श्री संजय ग्रोवर है) ने अपनी पिछली पोस्ट में ही कतिपय परिवर्तन करके उसे पुनः अपने ब्लॉग पर दिया है ।  अपने सुधी पाठकों तक उसे पंहुचाने के लिये मैं ग्रोवर जी की पोस्ट को ज्यों का त्यों यहां उद्धृत कर रहा हूं जो मुझे अपनी पोस्ट के उत्तर में मिली है।  इस पोस्ट के साथ ही मेरा उत्तर भी अंकित है । 

 

    आप इस बारे में क्या सोचते हैं, जानने की उत्सुकता है। जो सवाल ग्रोवर जी उथा रहे हैं, वह निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं ऐसे में आप सबकी भी जिम्मेदारी बनती है कि आप इस बहस में सक्रिय भागीदारी करें ।

 

आपका ही,

 

सुशान्त सिंहल

 

ये रहा संजय ग्रोवर जी द्वारा मुझे दिया गया उत्तर ( मेरी पोस्ट "मैं भला क्यों नाराज़ होने लगाके जवाब में)

 

Quote

 

सुशांत जी आप तो नाराज़ हो गए। यह क्या बात हुई कि जब आप अपने लेख का अंत '''वहीं जाकर चार टांगों पर नंगे घूमते रहो, कौन मना कर रहा है।''' जैसे वाक्यों से करते हैं तो वो आपको बड़ी धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक-सभ्य भाषा लगती है। ऐसा क्यों, भाई ?

ऊपर से आप मुझे नयी व्यवस्था का मिशन-स्टेटमेंट बनाने को कह रहे हैं जैसे कि पिछली व्यवस्था का आपने तैयार किया था ! सारे यथास्थ्तििवादियों की तान यहीं आकर टूटती है। कल को कोई मजदूर या एन.जी.ओ किसी टाटा-बिरला के यहाँ चल रहे शोषण का विरोध करेगा तो आप तो उससे यह कहेंगे कि पहले तुम खुद टाटा-बिरला जैसा कारखाना लगाओ या उसका कोई नक्शा बनाकर दो तब विरोध करना। अपने से अलग विचारों के लोगों को आप किस तरह से जंगल में जा बैठने का आदेश जारी करते हैं जैसे सारा समाज आपका जरखरीद गुलाम हो सारे लोग आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हों और सारे देश का पट्टा आपके नाम लिखा हो। सब वही खाएं जो आप बताएं, वही पहनें जो आप कहें, वही बोलें जो आप उनके मुंह में डाल दें। वाह, कैसी हत्यारी भाषा, कितनी अहंकारी सोच (?), कितनी तानाशाह प्रवृत्ति । मगर फिर भी धार्मिक ! फिर भी आध्यात्मिक ! फिर भी सामाजिक ! फिर भी सभ्य।आप कहते हैं कि मैं कोई व्यवस्था सुझाऊँ। मैं क्यों सुझाऊं भाई !?

 

हां, मुझे पता है कि एक दवा मुझे अत्यधिक नुकसान पहुँचा रही है। लेकिन क्या मै उसे सिर्फ इसलिए खाता जाऊं और तारीफ करता जाऊं कि बाज़ार में उसकी वैकल्पिक दवा उपलब्ध नहीं है और मैं खुद वह दवा बनाने में सक्षम नहीं हूँ ! मैं उस दवा के ज़हरीले असरात की बाबत आवाज़ उठाऊंगा तभी तो कुछ लोग नयी दवा बनाने के बारे में सोचेगे। तभी तो वे सब लोग भी आवाज़ उठाएंगे जो इंस दवा के ज़हरीले नतीजे तो भुगतते आ रहे हैं मगर सिर्फ इसलिए चुप हैं कि उन्हें लगता है कि वे अकेले हैं और उपहास के पात्र बन जाएंगे। स्त्री-विमर्श के मामले में ही देखिए, पहले विद्वान लोग कहते-फिरते थे कि ऐसी दो-चार ही सिरफिरी औरतें हैं जो धीरे-धीरे अपने-आप ''ठीक'' हो जाएंगी, नही ंतो हम कर देंगे। अब देखिए तो कहां-कहां से कितनी-कितनी आवाज़े उठ रही हैं। आरक्षण के मसले पर आप ही जैसे विद्वानों ने पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह को पागल तक कह डाला था। मगर आज सारी पार्टियां बढ़-चढ़कर आरक्षण दे रही हैं। इण्टरनेट के आगमन को लेकर आप ही जैसे लोगों ने तमाम हाऊ-बिलाऊ मचाई। मगर सबसे ज़्यादा फायदा भी आप ही जैसे लोग उठा रहे हैं। भले ही इंस नितांत वैज्ञानिक माध्यम का दुरुपयोग अपनी अवैज्ञानिक सोच को फैलाने के लिए कर रहे हों। इसलिए किसी भी नयी चीज़ का विरोध करने से पहले यह तो तय कर लीजिए कि अंत तक आप अपने स्टैण्ड पर कायम भी रह पाएंगे या नहीं !? और इंस ग़लतफहमी में तो बिलकुल मत रहिए कि सभी आपकी तरह सोचते (?) हैं और भेड़ों की तरह आप उन्हें जहां मर्ज़ी हांक ले जाएंगे।

 

कोई भी व्यवस्था न तो एक दिन में बनती है और न ही कोई एक आदमी उसे बनाता है। मगर आप मुझसे ऐसी ही उम्मीद रखते हैं। आप क्या समझते हैं कि मैं भी उन दस-पाँच पोंगापंथियों और कठमुल्लों की तरह अहंकारी और मूर्ख हूँ जो खुदको इतना महान विद्वान समझते हैं कि वही सारी दुनिया के लिए खाने-पीने-नाचने-पहनने का मैन्यू तय कर सकते हैं ! मेरी रुचि ऐसी किसी गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था में है ही नहीं कि सब मेरी तरह से जीएं। अगर मेरी टांगें पतली हैं और निक्कर मुझे सूट नहीं करता तो मै यह विधान बनवाने की कोशिश करुं कि सभी मेरी तरह फुलपैंट पहनेंगे। अरे जिसको जो रुचता है वो करे। आप कौन हैं तय करने वाले। दरअसल आपको किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने की आदत ही नहीं जिसमें सबके लिए जगह हो जब तक कि वह किसी तीसरे के जीवन में नाजायज घुसपैठ न कर रहे हों। आपको सिर्फ वही व्यवस्था समझ में आती है जो या तो आपके अनुकूल पड़ती हो या मेरे ! आपके हिसाब से तो फिर सती-प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-दमन, कन्या-भ्रूण-हत्या भी चलते रहने चाहिए थे क्योंकि फुलप्रूफ वैकल्पिक व्यवस्था तो न मेरे पास थी न आपके ! अगर सती-प्रथा हटानी है तो वैसी ही कोई और प्रथा होनी चाहिए न हमारे पास। नही तो, आपकी सोच के हिसाब से ही, सती-प्रथा का विरोध करने का हमारा कोई हक ही नहीं बनता।

 

कई बातें तो आप ऐसी मुझे समझा रहे हैं जो खुद आपको समझनी चाहिएं। जैसे कि फुल वाॅल्यूम पर रेडियो चलाने का उदाहरण। अपने एक पुराने व्यंग्य की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना शायद बेहतर भी होगा और कारगर भी:- ''क्यों! भावनाएं क्या सिर्फ आस्तिकों की होती हैं! हमारी नहीं!? हम संख्या में कम हैं इसलिए!? दिन-रात जागरण-कीर्तन के लाउड-स्पीकर क्या हमसे पूछकर हमारे कानों पर फोड़े जाते हैं? पार्कों और सड़कों पर कथित धार्मिक मजमे क्या हमसे पूछ कर लगाए जाते हैं? आए दिन कथित धार्मिक प्रवचनों, सीरियलों, फिल्मों और गानों में हमें गालियां दी जाती हैं जिनके पीछे कोई ठोस तर्क, तथ्य या आधार नहीं होता। हमनें तो कभी नहीं किए धरने, तोड़-फोड़, हत्याएं या प्रदर्शन!! हमारी भावनाएं नहीं हैं क्या? हमें ठेस नहीं पहुँचती क्या? पर शायद हम बौद्धिक और मानसिक रुप से उनसे कहीं ज्यादा परिपक्व हैं इसीलिए प्रतिक्रिया में बेहूदी हरकतें नहीं करते।''

बाते अभी बहुत-सी बाक़ी हैं।

 

संजय ग्रोवर (www.samwaadghar.blogspot.com)

 

 

Unquote

 

 

इस उत्तर पर मेरा प्रत्युत्तर

 

Quote

 

 

क्या अब आपको ऐसा नहीं लग रहा है कि आपके पास कहने के लिये सार्थक कुछ शेष नहीं बच रहा है? अपनी बात को सही सिद्ध करने की चेष्टा में आप उन सब चीज़ों को गालियां देते चले जा रहे हैं जिनका मैं खुद भी कम से कम उतना विरोधी तो हूं ही, जितने आप लगते हैं। इन सब कमियों के लिये मुझे कोसते रहने से भला क्या समाधान निकलेगा ? ठीक है, हम दोनों चौराहे पर खड़े होकर लाउडस्पीकर पर चीखना शुरु कर देते हैं - ये दुनिया खराब है ! ये दुनिया खराब है। कोई कुछ भी कहे, कुछ भी पूछे और कुछ नहीं बोलेंगे सिवाय इसके कि ये दुनिया खराब है ! ये दुनिया खराब है।

 

शायद इससे दुनिया सुधर जाये!

 

 

Unquote

 

 

Sushant K. Singhal

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क्षमायाचना

प्रिय मित्रों,

 

    जीवन की अन्य व्यस्तताओं के चलते आप सब से बतियाने का आज समय नहीं निकाल पा रहा हूं   आशा है, अन्यथा नहीं लेंगे और अपना स्नेह बनाये रखेंगे

 

आपका ही,

 

सुशान्त सिंहल

१२ फरवरी २००९

 

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

कैमरे की नज़र से दुनिया को देखिये !




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ये कंपनी बाग, सहारनपुर है ! अच्छा लगा ?




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ये सिखाने का नहीं सीखने का वक़्त है !

अगर आप मेरे ब्लॉग पर विज़िट करें तो देखेंगे कि दायें कॉलम में टिप्पणियों के बाद कॉ्लम लगभग खाली पड़ा है। मैं इस स्थान का उपयोग करने के लिये यहां कुछ फोटो लगाना चाहता हूं। पर कैसे ? कस्टमाइज़ में जाकर देखा तो ऐसा आभास हुआ कि यह स्थान केवल विगेट्स के लिये ही है। पर मैने कई सारे ब्लॉग्स पर यहां फोटो लगी देखी हैं । एनी हैल्प?

सुशान्त सिंहल

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

Cosina DSLR camera is not introduced yet !

Mr. Ratan Singh Shekhavat,

As far as I know, Cosina digital SLR cameras have not been introduced in the market as yet. May be I am not aware of it. Please consult some photography magazine (you will find a list of all major brands and models on the last four five pages of Better Photography magazine).

Sushant Singhal
www.sushantsinghal.blogspot.com

कौन सा कैमरा खरीदें (२) Which camera should I buy? (2)

            फोटोग्राफी ( photography ) का शाब्दिक अर्थ है - प्रकाश का अंकन ( photo = light, graphy = recording )  यदि प्रकाश नहीं है तो फोटोग्राफी भी नहीं हो सकती ।  हां, कुछ वीडिओ कैमरे ( video camera ) ऐसे हैं जो पूर्ण अंधकार ( zero lux shooting ) में भी चित्र लेते हैं पर वह प्रकाश के सहारे नहीं अपितु इंफ्रारैड किरणों ( infra-red radiation ) के सहारे चित्रांकन करते हैं जिसके लिये कैमरे पर दिया गया एक स्विच ( Night Shot or Super Night Shot )  सरका कर इस सुविधा को एक्टिवेट ( activate ) करना होता है।  ये फोटोग्राफ अच्छे तो नहीं होते पर किसी रिश्वतखोर को स्टिंग ऑपरेशन (sting operation ) के द्वारा जेल भिजवाने के लिये पर्याप्त हैं।  खैर !

 

            कैमरे के दो कार्य हैं - ) किसी दृश्य को व्यू फाइंडर पर दिखाना (showing a scene on view finder)  ) उस दृश्य को, यदि हम चाहें तो स्थाई रूप से किसी न किसी मीडिया पर अंकित कर देना ( recording the scene on one or the other media )  पहले ये मीडिया फिल्म होती थी, पर धीरे धीरे डिजिटल मेमोरी कार्ड फिल्म का स्थान लेते चले जा रहे हैं ।  वीडिओ कैमरा मैग्नेटिक टेप पर यह रेकार्डिंग करता है।  नवीनतम डिजिटल वीडिओ कैमरे मैमोरी चिप, डीवीडी या हार्ड डिस्क को मीडिया के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं ।  

 

            कैमरा किसी दृश्य को अच्छी प्रकार से व्यू फाइंडर में दिखा पाये, यह मूलतः कैमरे की लेंस की क्वालिटी ( quality of the camera lens)  पर निर्भर करता है।  यदि एक ही कंपनी ने आज दो लेंस बनाये हैं - एक का बाहरी ग्लास का डायमीटर  १ सेमी  और दूसरे का २ इंच है तो बड़ा लेंस छोटे की तुलना में कई गुना ज्यादा बारीकी से आपके दृश्य को अंकित कर पायेगा । इसे लेंस की रिज़ॉल्विंग पॉवर ( resolving power of the lens ) कहते हैं ।  कोई भी कंपनी कितनी भी प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसके मोबाइल फोन (mobile phone) में लगी हुई बेचारी नन्हीं सी लेंस किसी भी बड़ी लेंस का मुकाबला नहीं कर सकती । जब लेंस की अपनी सीमा आ जाये तो मेगा पिक्सल (megapixels) बढ़ाने से क्या हो जायेगावैसे मैने कुछ चित्र सोनी एरिक्सन मोबाइल फोन (Sony Erricson mobile phone )  से खींचे हुए देखे हैं जिनको देख कर सहजता से विश्वास नहीं होता कि ये मोबाइल फोन का रिज़ल्ट है।  

 

            यदि लेंस की क्वालिटी चेक करनी हो तो फोटो खींच कर उसे कम्प्यूटर के बड़े मॉनीटर पर ज़ूम करके देखिये ।  यदि पलकें, सिर के (या दाढ़ी के) बाल अलग-अलग और स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं तो लेंस की रिज़ॉल्विंग पॉवर (resolving power)  अच्छी है।  यह रिज़ॉल्विंग पॉवर जिन जिन बातों पर निर्भर करती है उनमे एक लेंस का डायमीटर भी है।  आप दुकान पर खड़े होकर और चीज़ें तो चैक नहीं कर सकते पर लेंस कितनी बड़ी है, यह तो नंगी आंखों से भी दिखाई देता है। 

 

            अतः फार्मूला नंबर १ - जब कैमरा खरीदें तो मेगा पिक्सल कितने हैं इस पर कम और लेंस कितने डायमीटर की है, इस पर अधिक ध्यान दें ।  लेंस का फ्रंट ग्लास एलिमेंट (front glass element)  का डाया ज्यादा है तो कम पिक्सल भी चलेंगे ।  (कम पिक्सल का यहां अर्थ है - minimum पांच मेगा पिक्सल)  चूंकि आम जनता मेगा पिक्सल पर जोर देने लगी है, इसलिये प्रतिस्पर्धा के चलते, कैमरा निर्माता कंपनियां ग्राहकों को अधिकाधिक इम्प्रेस करने के लिये मेगापिक्सल बढ़ाये चली जा रही हैं । ऐसा करने से बिना निर्माण खर्च बढ़ाये कैमरे का मूल्य बढ़ाया जा सकता है !

 

लेंस के बाकी आस्पेक्ट्स पर कल बात करेंगे ।  फिलहाल बंदे को अनुमति दीजिये । नमस्कार !

 

कौन सा कैमरा खरीदूं ? Should I buy an SLR camera?

Dear Friends,

Anoop has asked me about SLR camera - whether to buy or not. I will try to answer this question even though recommending / not - recommending to buy something gives me a lot of responsibility. I desperately hope you would accept it - if at all, only as a friendly advice. You may take it and you may reject it as well.

Control on focus, aperture and shutter speed - all these things are available on almost all digital cameras these days. If M (Manual), Tv (Time Value = Shutter Speed), Av (Aperture Value - Lens opening) & P (Programmed Auto) settings are given on a camera's CONTROL DIAL - it will give you all the controls that you may desire. I will tell more about these in a later chapter.


SLR cameras (whether digital or film version) are basically known as camera systems. Think of it in this way : There is a laptop - which has a monitor, keyboard, mouse, hard disk, CD-ROM/DVD writer, battery backup - everything neatly packed in a single, small casing. On the other hand, you have the desktop computers. One full cabinet for CPU, one large monitor, one UPS, one key board, one mouse etc. We call it a computer system. You can choose a monitor, a key board, a UPS of your personal liking. What's more, you are at full liberty to change individual parts of your computer system as and when you wish to do it. I can connect and disconnect hard disks, monitors, key boards, optical disk drive whenever I need to. But I have never tried to open my laptop. I am afraid of spoiling everything.

SLR cameras are for professionals / serious amateur photographers. These cameras offer following benefits to the users:

1. Expandability : This is the biggest benefit of an SLR camera. You can remove one lens and fit another on your camera. You can even have different types of view finders. If you have purchased a few lenses for your camera body, you can purchase one more camera body from the same manufacturer. All of your lenses will work on that camera body also. Suppose a camera has come with a 35-70 mm. zoom lens, you can buy additional lenses for it - 70-300, 80-200, 28-135 etc.

2. Exchangeability : If you have an SLR camera body plus a few lenses, you are often seen in camera shops - enquiring about new lenses available for your camera body. You may be wanting to exchange your camera body or a particular lens with another one.

There are many more accessories which are available in the market for SLR cameras which you can go on adding slowly and steadily. For example, your SLR camera will accept additional flash light but usually a compact camera doesn't have any provision for additional flash gun.

If you are going to buy an SLR camera, decide in favour of one with cool mind. Think of the lenses and other accessories which you may later wish to buy. If you have purchased a Nikon camera body, all your lenses and accessories should be from Nikon only. A Canon lens won't fit on a Nikon body and vice versa. There are compatibility issues to be thought about.

3. Fast response of the shutter : When you press the shutter of your digital camera, an SLR camera will take no additional seconds to capture the image. But in compact digital cameras, a delay of 1/4 sec., 1/2 sec. or even more may be there. The result ? When you pressed the shutter, the dancer was looking at you but by the time picture was captured by the camera, she had her back towards you! Or, you wanted to capture the beautiful smile of your baby, but when the picture was actually shot by the camera, he had a frown on his face !

Minus points of SLR cameras :

1. Only a very few, higher-end digital SLR cameras give you a preview of what the picture will be. Otherwise, you can see the picture only after it has already been taken.
When I switched over from compact to digital SLR, I took a few days to adjust myself to it. I was in the habit of looking at the LCD screen to compose my shot by previewing the image - even the colours, brightness, contrast etc., were visible to me. But no such thing was there in the SLR ! I used to feel very uncomfortable because of this absence of preview picture. Now I don't feel a need for it.

2. An SLR is bigger in size and bulky also. It can't be slipped into your pocket. If an opportunity arises to take a beautiful picture, you may find that the camera is packed
in your suitcase ! Hanging it in your neck may give an impression that you are a professional photographer besides giving you a neck ache. In a marriage or some other social function, it may be quite irritating if someone calls you "- Hey mister, take my photo !" If you can't bear it, go for a compact camera - as slim as possible so that no one will mistake you as a professional.

3. An SLR camera being bigger in size, is very much visible too. As soon as you aim your camera towards someone, you immediately get noticed. Some people may become suspicious as to why you are taking their pictures !

4. An SLR digital camera cannot make a movie for you. I hope this is the final setback of having an SLR. If you are a hobby photographer, you won't like to take two cameras - one digicam and another handycam with you on a picnic! A digital compact camera, being extremely slim, can be taken out of your pocket and can be used to take either the still images or to make a movie. And believe me, these movies are unbelievably good in terms of quality in home movie category. I have tried Sony and Canon compact cameras - both offer exceptionally good image quality. I would say the same for Olympus and Minolta too.

So, for hobby photographers, I strongly recommend not to buy a digital SLR. Those who have a photographic eye, can earn a lot of name and fame with a compact camera also. However, if you are a very serious amateur or a professional photographer, you may buy two SLR camera bodies and six-eight lenses plus a lot of other accessories for them. But if you are one of those people, you won't be reading my blog !

Sushant Singhal
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फोटोग्राफी क्लास रूम आरंभ हो चुका है। Photography class has commenced

प्रिय मित्रों,

      फोटोग्राफी ट्यूटोरियल Photography Tutorial आरंभ हो चुका है।  जो-जो मित्र इसमें रुचि ले रहे हैं, कृपया अपनी अपनी समस्याओं को/प्रश्नों को विस्तार से टिप्पणियों में लिख कर दें ताकि किसी पोस्ट में अलग सेउनका भी समाधान करने की चेष्टा कर सकूं। आपके प्रत्येक प्रश्न का उत्तर मेरे पास अवश्य होगा, ऐसी कोई भ्रांति मुझे नहीं है, पर अपनी ओर से प्रयास अवश्य करूंगा।  यदि नहीं आता होगा तो क्षमा मांग लूंगा । जो इस वर्ल्डवाइड क्लास-रूम (World-wide Photography Classroom) को नियमित रूप से अटैण्ड करना चाहते हैं, उनसे प्रार्थना है कि इस ब्लॉग को फॉलो करना आरम्भ कर दें। आपके ऐसा करने से मुझमें भी इस फोटोग्राफी क्लास (Photography class) को नियमित रूप से चलाने की जिम्मेदारी की भावना बनी रहेगी। 

    इस क्लास में अधिकांश चर्चा फोटोग्राफी की तकनीक (Photography technique)  पर ही होगी ।  कलात्मक पक्ष पर तो प्रॅक्टिकल कराये जा सकते हैं। मैं आपको एसाइनमॅंट (photography assignments)  दे सकता हूं । यदि आप तदनुसार प्रयोग करते हुएफोटो खींच कर मुझे भेजेंगे तो उन पर भी चर्चा हो सकेगी। ये तो स्वाभाविक ही है कि लेंस पर, एपर्चर, शटर पर भी चर्चा होगी । 

            फिल्म कैमरों में कोसिना एस. एल, आर. ( Cosina SLR camera ) सफल कैमरों में गिना जाता रहा है।  अक्सर वे प्रोफेशनल फोटोग्राफर जो निकॉन (Nikon) या पेंटैक्स ( Asahi Pentax ) कैमरा नहीं खरीद पाते हैं, कोसिना (Cosina) खरीदते रहे हैं और बहुत अच्छे परिणम लेते रहे हैं।  सच तो ये है कि जिस प्रकार अच्छी डिक्शनरी खरीद लेना विद्वान बन जाने की गारण्टी नहीं हो सकता उसी प्रकार अच्छा कैमरा ले लेने से कोई बहुत अच्छे चित्र खींचने की गारण्टी नहीं कर सकता । 

    आज रात तक फिर कुछ मैटर देने का प्रयास करूंगा।  तब तक के लिये विदा दीजिये। नमस्कार! 

आपका ही, 

सुशान्त सिंहल

१०.०२.२००९ 

P.S.  जो कुछ लिख रहा हूं, वह अरण्य रोदन नहीं है - यह मुझे तब ही पता चल पाता है, जब आप लोग कुछ प्रतिक्रिया देते हैं, मेरे लिखे हुए से सहमति या असहमति व्यक्त करते हैं।  मेरे विचारों से कोई भी सहमत हो, यह कतई आवश्यक नहीं है। 

 

Sushant K. Singhal

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सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

कौन सा कैमरा खरीदें ? Which camera to buy?


एक प्रश्न जो मुझसे बार-बार पूछा जाता है वह है - "कैमरा कौन सा लें? Which camera to buy? " कुछ साथियों ने मेरे ब्लॉग पर भी कैमरा न ले पाने का जिक्र किया है। इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले मेरे लिये कुछ बातों का जानना आवश्यक होता है -

१- फोटोग्राफी की तकनीक समझने में कितनी रुचि है? How much do you wish to learn about the photography technique? बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनको न तो फोटोग्राफी तकनीक के बारे में कुछ पता है और न ही जानने की इच्छा / धैर्य है । उनको तो ’देखो और बटन दबाओ’ (aim and shoot simplicity) कैमरा ही चाहिये। दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे हैं जो जिज्ञासु प्रवृत्ति के हैं । ऐसे लोग मोटर साईकिल भी खरीदेंगे तो उसका मैनुअल जरूर पढ़ेंगे । "देखो और दबाओ" कैमरे दो प्रकार के हैं - एक तो वो जिनको फिक्स्ड फोकस (fixed focus or box camera) या बॉक्स कैमरा कहा जाता था। एक जमाना था कि आग्फा (Agfa) कंपनी के २००-३०० रुपये मूल्य के बॉक्स कैमरे (Agfa Klik III, Agfa Isoly) जन्म दिन पर उपहार स्वरूप पाकर हृदय गदगद्‌ हो जाता था । लोग उन सीधे साधे कैमरों से भी इतनी अच्छी फोटो खींच लेते थे कि अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी प्रतियोगिता (International photography competitions) में सांत्वना पुरस्कार (consolation prizes) तो ले ही आते थे। इन कैमरों में शटर (shutter) दबाने के अलावा और कुछ कंट्रोल होता ही नहीं था। लेंस भी कांच की न होकर प्लास्टिक की थी। ये कैमरे श्वेत-श्याम युग (black and white photography) का प्रतिनिधित्व करते थे। आज इन कैमरों की महत्ता म्य़ुज़ियम में सजाने तक ही है। डिजिटल क्रांति आने के बाद तक भी जो फिल्म वाले फिक्स्ड फोकस बॉक्स कैमरे बहुत अच्छे (व सस्ते) माने जाते थे व मुझे सबसे अधिक प्रभावित करते थे - वह थे - कोडक कंपनी का ’क्रोमा’ कैमरा (Kodak Kroma) और याशिका कंपनी क ’एम एफ २ सुपर’ कैमरा (Yashika MF 2 Super camera) ! १५०० रुपये से २००० रुपये की कीमत में इनसे अच्छा कैमरा मेरी जानकारी में कोई नही है। इनकी लोकप्रियता कम होने का कारण सिर्फ़ ये है कि आज डिजिटल युग में कोई सा भी फिल्म कैमरा लोकप्रिय नहीं रह गया है। ये डिजिटल कैमरों के युग से पहले के बाशिंदे हैं ।

दूसरी ओर, "देखो और दबाओ" सुविधा हर प्रकार की नवीनतम तकनीक से सुसज्जित महंगे डिजिटल कैमरे भी प्रदान करते हैं । आप कैमरे को ऑटो मोड (Auto mode) पर डाल दें तो कैमरे के अंदर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक सर्किट (Electronic Circuit) हर अड्जस्ट्मैंट की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेता है और आपको "देखो और दबाओ" स्वतंत्रता (Aim and shoot simplicity) प्रदान कर देता है। हद ये है कि कुछ नवीनतम मॉडल के कैमरों में तो चेहरा पहचानने (Face detection technology) व मुस्कुराहट पहचानने (Smile Detection technology) की भी तमीज़ है । जब तक आप बत्तीसी नहीं दिखायेंगे, कैमरा फोटो ही नहीं खींचेगा! (नेता लोग ऐसे ही कैमरों से फोटो खिंचवाना पसंद करने लगे हैं ताकि सुबह अखवार में उनकी भुवन-मोहिनी मुस्कान पाठकों का स्वागत करे! कोई मुआ पत्रकार मंच पर सोते हुए नेताजी की फोटो अपने अखबार को न भेज दे! )। इस कैमरे को फोटोग्राफी में पारंगत किसी फोटो कलाकार के हाथ में दे दीजिये तो वह सारे कंट्रोल ऑटो (auto) के बजाय मैनुअल (manual) कर देगा और फिर कैमरे के कंट्रोल से ऐसे खेलेगा जैसे कोई पेंटर ब्रश और रंगों से खेलता है। निश्चय ही ये कैमरे लगभग १०,००० रुपये के आस पास मूल्यवर्ग से आरंभ होते हैं और इनका मूल्य कितना हो सकता है, इसकी कोई सीमा नहीं है। लगभग सभी विख्यात कैमरा निर्माता कंपनियां ऐसे कैमरे लेकर बाज़ार में मौज़ूद हैं । सोनी ( Sony ), कॅनन ( Canon ), निकॉन ( Nikon ) , ओलिंपस ( Olympus ), मिनोल्टा ( Minolta ), पेंटैक्स ( Pentax )आदि-आदि कंपनियों के अनेकानेक मॉडल के कैमरे बाज़ार में उपलब्ध हैं। इनमे किसी भी कंपनी को दूसरी से कमतर या बेहतर बताना अत्यंत कठिन है। मामला व्यक्तिगत पसंद, नापसंद का आ जाता है । कोडक Kodak के बारे में जरूर कहूंगा कि उसके बनाये हुए Kodak Easy Share डिजिटल कैमरे मुझे प्रभावित करने में पूर्णतः असमर्थ रहे हैं । अतः यदि आप मेरी पसंद-नापसंद को कुछ अहमियत देना चाहते हैं तो डिजिटल कैमरों में कोडक छोड़ कर कोई सी भी कंपनी का कैमरा चुन लें।

कुछ लोग मेगा पिक्सल MP or Mega Pixels को लेकर भी बहुत सोच - विचार में रहते हैं। उनको लगता है कि जितने ज्यादा पिक्सल होंगे उतना ही कैमरा अच्छा होगा । पर जब मैने वर्ष २००१ में पहला डिजिटल कैमरा खरीदा था तो वह ३.१ मेगा पिक्सल का कैनन (Canon 3.1 megapixel camera) का कैमरा था । आज की तारीख में कोई ३.१ मेगा पिक्सल के कैमरे को मोबाइल फोन में ही पसंद करे तो करे, कैमरे में तो शायद ही कोई लेना चाहेगा । पर मैने अपने उस कैमरे से 30" x 40" आकार के प्रिंट सफलता पूर्वक बनाये हैं। ६ मेगा पिक्सल से अधिक का कैमरा आप तब ही खरीदें जब आपकी जेब में भरपूर हरियाली हो। छः मेगा पिक्सल का अच्छा कैमरा ( 6 megapixels camera) जितने बड़े चित्र दे देगा उस आकार के चित्र आप शायद ही चार पांच से अधिक पूरे जीवन में बनवायेंगे । अतः छः मेगा पिक्सल के बाद (और उससे पहले भी), पिक्सल पर कम और लैंस की क्वालिटी (lens quality) पर अधिक ध्यान दें।

(ये श्रंखला जारी है)

सुशान्त सिंहल

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

है मंजूर तो बोलो हां !

सहारनपुर की पुलिस ! तुझे मैं क्या नाम दूं? नाकारा कहूं, भ्रष्ट कहूं, अक्षम कहूं, सोच में पड़ गया हूं।  १५ वर्ष के छात्र सजल का अपहरण और फिर निर्मम हत्या, हत्यारों का पुलिस की पहुंच से बाहर रहना तो आपके नाकारापन का नवीनतम प्रमाण है। 

 

पुलिस का ये कहना कि "हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है - बिल्कुल सही है, पर सादी छड़ी तो होगीया वो भी नहीं है? अपने व्यक्तिगत अनुभव के तीन मामले पाठकों के सम्मुख रख रहा हूं।  आप ही बतायें - इनके लिये भी जादू की छड़ी चाहिये होती है क्या?

 

- मेरा एक महंगा मोबाइल सैट खो गया जिसके लिये पुलिस थाने में एफ आई आर दर्ज़ करा दी। वह नम्बर भी बता दिया जिसे जादू की छड़ी बताया जाता है - इलेक्टॉनिक सर्विलियांस पर डालो और जैसे ही फोन कहीं पर प्रयोग किया जायेगा, पुलिस कंट्रोल रूम में कंप्य़ूटर उसे पकड़ लेगा । पर सहारनपुर पुलिस का कंट्रोल रूम पूर्णतः नाकारा है । कुछ नहीं पकड़ता ।  आज तक कोइ सूचना नहीं है ।

 

- हमारी संस्था ने एक स्मारिका के प्रकाशन की आयोजना की तो मित्रों ने कहा कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक महोदय का भी शुभकामना संदेश ले लिया जाये ।  दो व्यक्ति उनसे भेंट करने उनके कार्यालय गये, अपना अनुरोध सौंपा । वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक महोदय ने वायदा किया कि 'कल' आप मेरे कार्यालय से शुभ कामना संदेश व मेरी फोटो प्राप्त कर लेंपंद्रह दिन तक चक्कर लगाने के बावजूद उनका नाकारा कार्यालय एक शुभकामना संदेश देने में असमर्थ रहायही हाल जिलाधिकारी कार्यालय का भी रहा ।  क्या एक शुभकामना संदेश देने के लिये किसी जादू की छड़ी की जरूरत होती हैऔर बात शुभकामना संदेश की नहीं हो रही ।  बिना उस संदेश के भी हमारी पत्रिका प्रकाशित हो गई।  आई. जी. महोदय से संदेश हेतु अनुरोध किया तो उन्होंने तुरंत संदेश बना कर दिया जो आभार सहित प्रकाशित किया गया। मंडल आयुक्त महोदय ने पत्रिका का विमोचन भी किया ।  बात हो रही है - कार्यक्षमता की ।  जो अधिकारी एक शुभकामना संदेश के लिये १५ दिनों तक चक्कर लगवा सकता है, वह न्याय व कानून व्यवस्था का क्या खाकर पालन करवायेगा? हां ये जरूर हो सकता है कि इस आलोचना के लिये मुझ पर अपना गुस्सा निकाल लें। 

 

- प्रताप मार्केट सहारनपुर के निकट जोगियान पुल पर हर रोज़ ट्रैफिक जाम दिन में कई कई बार लगता है । यदि भूले भटके से कोई पुलिस कर्मी वहां होता भी है तो जाम को कैसे हटया जाये, इसका उसे कोई आइडिया ही नहीं होता ।  वहीं पर तीन चार दुकानें पुरानी मोटर साइकिलों की खरीद फरोख़्त की पिछले दो - एक साल में खुली हैं जो आधी सड़क घेर कर रखती हैं क्योंकि इतनी सारी मोटर साइकिलें दस बाई दस की दुकान में कैसे समा सकती हैंहमारा पुलिस प्रशासन, नगर पालिका के अधिकारीगण उस अतिक्रमण को देख कर भी अनदेखा करता रहते है - पता नहीं चल पाया कि इन अधिकारियों को उन दुकानों से इतना मोह क्यों हैआप कुछ हिंट देंगेक्या इस अतिक्रमण को हटाने के लिये भी किसी जादू की छड़ी की आवश्यकता पड़ती है?

 

मेरी तुच्छ बुद्धि में तो एक उपाय आता है - सारे पुलिस अधिकारियों व पुलिस कर्मियों के लिये शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक फिटनेस व मेंटल एप्टिट्यूड की कठोर परीक्षा का आयोजन होना चाहिये - जो जो उसमे पास हो जायें वह जनता की सेवा करें और जो फेल हो जायें, वो सब नेताओं की रक्षा करें ।  बोलिये क्या कहते हैं आपहै मंजूर तो बोलो 'हां' !        

 

 

Sushant K. Singhal

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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

मैं भला क्यों नाराज़ होने लगा !

प्रिय श्री संजय ग्रोवर, (www.samwaadghar.blogspot.com)

 

           सबसे पहली शिकायत तो ये कि आपको सत्य, सरल ह्रृदय से की हुई प्रशंसा भी मेरी नाराज़गी लगी, तीखा कमेंट लगी - इससे मैं बहुत क्लेश का अनुभव कर रहा हूं । कई बार पढ़ा है कि शब्द बहुत बेइमान होते हैं।  कोई व्यक्ति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिये जिन शब्दों का चयन करता है, वही शब्द सामने वाले के सम्मुख कुछ और भावनायें व्यक्त कर आते हैं ।  मेरी लेखनी आप के जैसी समर्थ नहीं है - यह तो स्पष्ट हो ही गया। 

 

            हां, ये भी सम्भव है कि आपको अपनी प्रशंसा सुनने का व उसे विनम्रता पूर्वक स्वीकार करने का अभ्यास न हो।  शायद इसीलिये आप प्रशंसा में भी निहितार्थ ढूंढते रहते हैं ।  मैने पिछली बार आपके हृदय की विशालता की बात कही, आपको वह बुरी लगी; इस बार आपका लेखन अच्छा लगा, तो उसमें भी आपको व्यंग्य नज़र आयाआपको शायद लगता है कि 'ये समाज इतना खराब है, इसमें सब लोग इतने घटिया हैं, यहां की सारी व्यवस्थायें इतनी शोषणकारी हैं, ऐसे में भला कोई व्यक्ति खुले दिल से किसी की प्रशंसा  क्यों करने लगा!!!!  जरूर इसमे कोई न कोई व्यंग्य या ताना छिपा होगा ।'    मुझे तो ये भय लगने लगा है कि मैं कुछ भी लिखूंगा आप उसमे निहितार्थ निकालते चले जायेंगे।  भाई ग्रोवर जी, आप शब्दों पर मत जाओ, "भावनाओं को समझो" !

 

            हर व्यक्ति की सोच उसके अनुभवों के आधार पर बनती है।  इन अनुभवों में उसकी शिक्षा - दीक्षा, उसके संस्कार -- सभी कुछ आ जाता है। 'मेरी सोच मेरे लिये सही है' और 'आपकी सोच आपके लिये सही है' इतना तो ठीक है ही, पर मुझे यह गुंजाइश अवश्य रखनी चाहिये कि मेरी ही सोच नहीं, आपकी सोच भी सही है / सही हो सकती है।  दुनिया में तीन प्रकार के सच हैं - मेरा सचआपका सच और वास्तविक सच

 

            आप इस समाज के लिये मिशन स्टेट्मैंट नहीं लिखना चाहते, मत लिखिये पर जिस 'शोषणकारी व्यवस्था' में रहने के लिये आप स्वयं को विवश पा रहे हैं, उसके प्रणेताओं ने जो मिशन स्टेट्मैंट,  जो लक्ष्य अपने सम्मुख रखा था, उसे उन्होंने निम्न शब्दों में व्यक्त किया था -

 

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्भाग्भवेत !" 

(सब सुखी हों, सब निरोगी हों, सब परस्पर प्रेमभाव रखें, किसी को भी कोई दुःख न हो ।)

 

कुछ ऐसी ही भावनाओं का प्राकट्य एक और श्लोक में पढ़ने को मिला -

 

"न त्वमहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुनर्भवं

कामये दुःखत्प्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्

(न तो मुझे आपसे राज्य चाहिये, न स्वर्ग की ही कामना है, न मुझे पुनर्भव की लालसा है।  मैं तो केवल यही कामना करता हूं कि दुःख पीड़ित मानवता के कष्टों का नाश हो ।)

 

            एक और स्थान पर मैने पढ़ा था - "न राज्यं न च राजासीत, न दंडो, न च दांडिकः ......" 

(न तो कोई राजा हो, न ही कोई शासित हो, न कोई दंड देने वाला हो और न ही कोई दंड पाने वाला होहर कोई अपने - अपने धर्म का पालन करते हुए समरस समाज बना कर सुखपूर्वक रहे!)   

 

            अब प्रश्न उठता है कि मेरा धर्म यानि मेरे कर्तव्य क्या हैंधर्म को परिभाषित करते हुए कहा गया था कि हर व्यक्ति के दो प्रकार के धर्म हैं - एक उसका व्यक्तिगत धर्म और दूसरा उसका सामाजिक धर्मधैर्य, क्षमा, अहिंसा, पवित्रता आदि दस धर्म गिनाये गये - जो व्यक्तिगत धर्म की श्रेणी में आते हैं ।  दूसरी ओर समाज की भिन्न भिन्न इकाइयां (मेरा परिवार, मेरा पड़ोस, मेरा मुहल्ला, मेरा नगर, मेरा जिला, प्रदेश, देश, यह दुनिया, यह सृष्टि)- उनके प्रति मेरा धर्म - यह मेरा सामाजिक धर्म है !  - ये सब आकार में बढ़ते हुए क्रम में आते हैं। मुझे अपने स्वयं के प्रति कर्तव्यों का तो निर्वहन करना है, पर इन सब सामाजिक इकाइयों के प्रति जो मेरे कर्तव्य हैं, उन सब का भी पालन मुझे करना है। 

 

            क्या कभी ऐसी स्थिति आयेगी जब दो भिन्न भिन्न इकाइयों के प्रति मेरे कर्तव्यों के बीच में टकराहट होने लगेजी हां, इस स्थिति की भी पूर्व कल्पना करते हुए कहा गया कि मुझे बड़ी इकाई को प्राथमिकता देनी होगी।  यदि मैं देश की तुलना में अपने प्रदेश को प्राथमिकता देता हूं तो अधार्मिक कहलाऊंगा, अपने कर्तव्य से विमुख हो गया माना जाऊंगा । यदि अपने बीवी-बच्चों के लालन-पालन के अपने दायित्व को भूल कर अपने व्यक्तिगत उत्थान के लिये सन्यासी बन जाऊं तो अधार्मिक हूं ।  पवित्रता मेरा व्यक्तिगत धर्म है पर अगर मैं डॉक्टर हूं तो मरीज़ का इलाज करना मेरा सामाजिक धर्म है और इस धर्म के पालन के लिये मुझे खून, थूक, मल, मूत्र, मवाद के बीच में रहना पड़ सकता है। 

 

            मान लीजिये मैने सत्य बोलने का व्रत ले रखा है।  बड़ी अच्छी बात है।  ये मेरा व्यक्तिगत धर्म है कि मैं सत्यव्रत का पालन करूं ।  पर, कल्पना कीजिये कि 'मुझे बचाओ-बचाओ' चीखती हुई कोई युवती अस्त - व्यस्त, फटे वस्त्रों में, घबराई हुई सड़क पर भागी चली आ रही दिखाई देती है और मेरे देखते-देखते मेरे घर के बगल में आबचक में छुप जाती है। क्षण भर पीछे ही दस पांच गुंडे आकर मुझसे पूछें कि किसी लड़की को इधर से जाते देखा क्यातो ऐसे में मुझे क्या करना चाहियेयदि मैं अपने सत्य व्रत का पालन करने के लिये उनको बता देता हूं कि जिसे ढूंढ रहे हो, वह लड़की इस आबचक में छुपी बैठी है तो हमारे प्राचीन मनीषियों की निगाह में मुझसे बड़ा अधार्मिक व्यक्ति कोई नहीं ।  इसी प्रकार, अहिंसा मेरा व्यक्तिगत धर्म है पर सैनिक के नाते देश पर हमला करने आये दुश्मनों को मार गिराना मेरा सामाजिक धर्म है - मुझे अपने व्यक्तिगत धर्म का नहीं, सामाजिक धर्म का पालन करना होगा।  अपनी व्यक्तिगत शत्रुता के कारण किसी को मार देने पर फांसी मिलेगी पर देश की रक्षा करते हुए शत्रुओं को मार गिराऊं तो भारत रत्न मिलेगाऔर आगे बढ़ कर सोचेंअगर अपने देश की रक्षा करने के नाम पर मैं हिरोशिमा - नागासाकी पर बम फेंक दूं तो मानवता का सबसे बड़ा शत्रु !      

 

            ग्रोवर जी, ऐसा नहीं है कि आज आपको जो विकृतियां इस समाज में दिख रही हैं, उनसे मैं अपरिचित हूं।   जितने वर्ष आपको इस धरती पर आये हुए होंगे, लगभग उतने ही वर्षों से यह धरती मेरा भी बोझ उठाये हुए घूम रही हैअंतर सिर्फ हमारी सोच में हैमुझे लगता है कि कुशिक्षा के कारण या अशिक्षा के कारण हम सब अपने अपने धर्म को (यह तो नहीं स्पष्ट करना पड़ेगा न कि यहां 'धर्म' का अर्थ'कर्तव्य' है?) नहीं समझ पा रहे हैं और इसीलिये हर कोई एक दूसरे के दुःख का कारण बन रहा है। 

 

            नंगे घूमना मेरा व्यक्तिगत अधिकार हो सकता है पर यदि इससे समाज में अन्य लोगों को हानि हो रही हो तो उनकी खातिर मुझे अपने इस अधिकार को अपने बैडरूम तक सीमित कर लेना चाहिये - यही मेरा धर्म है।  यह ठीक उसी प्रकार से है कि फुल वॉल्यूम पर गाना सुनना मेरा मूलभूत अधिकार होगा पर अगर मेरे पड़ोस में बच्चे बोर्ड की परीक्षाओं में व्यस्त हैं तो मुझे अपने इस अधिकार में कटौती करनी होगी।  तभी मैं अच्छे पड़ोसी का धर्म निभा पाऊंगा ।  यदि हम धर्म - अधर्म की, कर्तव्य - अकर्तव्य की विश्व की इस प्राचीनतम परिभाषा को समझ लें, हृदयंगम कर लें तो हम पुनः एक बार सही मार्ग पर चल निकलेंगे। पर समस्या ये है कि हमारे पाठ्यक्रम में यह शिक्षा कहीं है ही नहीं ।  और तो क्या कहें, धर्म का पाठ पढ़ाने को अपनी जीविका बनाने वाले पंडितों, पुरोहितों, कथा-वाचकों, शिक्षा-शास्त्रियों को भी यह जानकारी देने की आवश्यकता है, ऐसा मेरा अनुभव है।   

 

            आज जो कुछ हमारे सामने गड़बड़ियां दिखाई दे रही हैं, वह सब आपको और मुझे समान रूप से व्यथित करती हैं ।  मैं यथास्थितिवादी होता तो स स्थिति को पसन्द करता होता । परिवर्तन की आकांक्षा मुझे भी उतनी ही है जितनी आपको, परंतु वह परिवर्तन क्या हो, कैसा हो, इस पर बहस होनी आवश्यक है । अगर आपकी सोच के बारे में मेरा आकलन सही है तो आपको ये लगता है कि हमारे मनीषियों के मौलिक चिंतन में ही दोष है, उनकी विज़न ही शोषणकारी रही है  और हमें एक ऐसी नई व्यवस्था कायम करनी होगी जिसमें व्यक्ति पर कोई पाबंदी न हो, समाज में  पूर्ण लोकतंत्र हो।  यदि मैं बीच सड़क पर चलना चाहूं तो मुझे रोका टोका न जायेभले ही कोई वाहन आकर मुझे कुचल क्यों न देयदि कोई मुझे बीच सड़क पर चलने से मना करेगा तो मेरे पास कुछ रटे रटाये मुहावरे हैं ही । मैं उसे यथास्थितिवादी कहूंगा, शोषणकर्ता कहूंगा, प्रगति-विरोधी कहूंगा और जो जो भी मेरे मन में आयेगा, वह सब कहूंगा!

 

            परिवर्तन की आपकी आकांक्षा और सोच का मैं बहुत आदर करता हूं।  मेरा मानना है कि - लीक छोड़ तीनों चलें - शायर, सिंह, सपूतइसी लिये तो मैं आपसे कह रहा था कि कोई बेहतर विकल्प सामने रखिये - दुनिया उस पर विचार करेगी, यदि वह विकल्प व्यावहारिक हुआ तो उसे स्वीकार भी करेगी।  जिस-जिस क्रान्तिकारी चिंतक ने भी समाज को कुछ नया देने का प्रयास किया, हमारे समाज में उसे  महापुरुष मान कर सम्मान दिया गया है। पर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आप मौजूदा विकृतियों को देख देख कर परेशान तो हो रहे हैं पर कोई हल सुझाने का आह्वान करो तो अपनी असमर्थता देख कर आप कटु हो जाते हैं। मैं बड़ी उत्कंठा से आपसे विकल्प  मांग रहा था पर आपको उसमें भी मैं दोषी नज़र आने लगा हूं । अब आप ही बताइये, मैं क्या करूं

 

            सही क्या है और गलत क्या है इसे जानने का मेरे पास तो एकमात्र फंडा यही है - "सामाजिक धर्म के पालन के मार्ग में यदि मेरा व्यक्तिगत धर्म आने लगे तो मुझे उसे भूलना होगा - यही सच्ची धार्मिकता है, यही मेरा वास्तविक कर्तव्य है।"

 

सुशान्त सिंहल

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