रविवार, 20 दिसंबर 2009

इन विचारणीय बिन्दुओं पर आप क्या सोचते हैं?

प्रिय मित्रों,

 

शिक्षा के क्षेत्र में हमारे देश में अनेकानेक विरोधाभास दृष्टिगोचर होते हैं। कुछ संस्थान ऐसे हैं जो शिक्षा के उच्च स्तर के लिये प्रसिद्ध हैंवहां प्रवेश पाना किसी भी विद्यार्थी का स्वप्न हो सकता है।  वहीं दूसरी ओरदेश के हज़ारों नगरों, कस्बों में ऐसे विद्यालय, महाविद्यालय हैं जहां पढ़ाई आम तौर पर होती ही नहीं।  छात्र - छात्रायें अगर इन विद्यालयों में जाते भी हैं तो सोशल नेटवर्किंग के लिये, नेतागिरी सीखने के लिये या येन-केन-प्रकारेण एक अदद डिग्री हासिल करने के लिये।  अध्यापक - अध्यापिकायें इन कॉलेजों में आते हैं तो उपस्थिति पंजिका में हस्ताक्षर करने और वेतन लेने के लिये, धूप सेंकने के लियेट्यूशन के लिये आसामी ढूंढने के लिये या फिर साथियों के साथ गप-शप करने के लिये। 

 

प्राइमरी या माध्यमिक स्तर की शिक्षा का जहां तक संबंध हैदिखाई ये दे रहा है कि प्राइवेट स्कूलों में (जिनको अंग्रेजी माध्यम या पब्लिक स्कूल भी कहा जाता है)  शिक्षा का माहौल सरकारी स्कूलों या हिन्दी मीडियम के स्कूलों की तुलना में बहुत बेहतर है। अंग्रेज़ी माध्यम के सारे स्कूलों का स्तर अच्छा हो, ऐसा नहीं है। (हर शहर, कस्बे में असंख्य स्कूल ऐसे भी हैं जो ढेर सारा धन कमाने के इच्छुक शिक्षित अथवा अर्द्धशिक्षित लोगों ने अपने घर के कुछ हिस्से में ही खोल लिये हैं और एक बोर्ड टांग कर, अपने घर की नौकरानी को आया और पत्नी को प्रधानाचार्या बना कर और खुद प्रबंधक बन कर विद्यालय आरंभ कर दिया गया है।  मुहल्ले पड़ोस की लड़कियों को छः सौ - आठ सौ रुपये प्रतिमास देकर अध्यापिका बना लिया गया है।  परन्तु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि इन स्कूलों के अध्यापकों, अध्यापिकाओं को पढ़ाना आता हो या न आता हो; अपेक्षित सुविधायें हों अथवा न होंस्कूल का प्रबंधन वर्ग पढ़ाई के माहौल को लेकर, अनुशासन को लेकर, और अपने विद्यालय की छवि निर्माण को लेकर सजग अवश्य है।)      

 

डिग्री कॉलेजों का जहां तक संबंध है, अंधेर नगरी, चौपट राजा वाली कहावत यहां चरितार्थ होती दिखाई देती है। छात्रों से पूछो तो वह अध्यापकों को दोष देते हैं; अध्यापकों से पूछो तो छात्रों को, प्रिंसिपल को, विश्वविद्यालय को या शिक्षा व्यवस्था को दोष देते हैं।  प्रिंसिपल से पूछो तो वह स्थानीय नेताओं को और उनके संरक्षण में पलने वाले गुंडेछाप छात्रों को कॉलेज का वातावरण प्रदूषित करने के लिये दोषी ठहराते हैं, हर दूसरे-तीसरे दिन छुट्टी करने के लिये सरकार को, विश्वविद्यालय को, अध्यापकों को दोषी ठहराते हैं।  प्रबंधन वर्ग से पूछो तो वह शिक्षण तंत्र में, सरकार में, विश्वविद्यालय की नीतियों में दोष ढूंढते हैं।

 

इस सब के बारे में विचार करें तो निम्न प्रश्न उभरते हैं :

 

१-   क्या हमारे अध्यापक अध्यापन को लेकर गंभीर हैंया, वह सिर्फ ट्यूशन को लेकर ही गंभीर हैं?   क्या ऐसे भी अध्यापक विद्यालयों में, महाविद्यालयों में नौकरी पा गये हैं जो अध्यापन कार्य के लिये पूर्णतः अनुपयुक्त हैं यदि हां, तो इस समस्या का क्या हल है?

 

२-  क्या छात्र-छात्रायें अध्ययन को लेकर गंभीर हैंयदि नहीं तो फिर वह कॉलेजों में प्रवेश लेते ही क्यों हैंजो छात्र-छात्रायें पढ़ाई को लेकर गंभीर हैं पर उनको अपेक्षित माहौल नहीं मिल पा रहाक्या उनके पास इस समस्या का कोई समाधान हो सकता है?

 

३-  क्या इस मामले में हमारे शिक्षा तंत्र में, शिक्षण पाठ्यक्रम में भी कुछ दोष हैं?

 

इन विचारणीय बिन्दुओं पर आप क्या सोचते हैंआपके विचार हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं।  अतः कृपया हमें अवश्य ही लिखें।   

  

संपादक

द सहारनपुर डॉट कॉम

 

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शनिवार, 5 दिसंबर 2009

"सिर्फ अम्मा ही क्यों ? पिताजी क्यों नहीं?"

मित्रों,

 

"सिर्फ अम्मा ही क्यों ? पिताजी क्यों नहीं?" हमारे अनेक पाठकों ने हमारे सम्मुख प्रश्न किया है कि आप www.the-saharanpur.com/amma.html  पर केवल "अम्मा" को ही समर्पित रचनायें छाप कर क्यों रुक गये हैंक्या हमारे जीवन में पिता का स्थान अम्मा से कमतर होता हैअब आप ही बताइये, हम अपनी दो आंखों में किसे से ज्यादा महत्वपूर्ण मान सकते हैं भला?   पर हमारे सुधि पाठकों की यह प्यार भरी शिकायत जायज़ है और इसीलिये आज हम एक अद्‌भुत काव्य रचना से अपने पूर्वजों को प्रणाम करने का यह क्रम पुनः शुरु कर रहे हैं।  उम्मीद है कि आप लोग अपने पूज्य पिता श्री के प्रति अपने भाव-पुष्प समर्पित करने में पीछे नहीं रहेंगे।  तो मित्रों, ये रही इस अभियान की प्रथम रचना !

 

मेरे बाबूजी !

 

सौ सुमनों का एक हार हैं मेरे बाबूजी,

बाहर भीतर सिर्फ प्यार हैं मेरे बाबूजी !

 

सारे घर को जिसने अपने स्वर से बांध रखा,

उस वीणा का मुख्य तार हैं मेरे बाबूजी !

 

पूरी रचना पढ़ने के लिये क्लिक करें >>>>

 

यदि आपने अम्मा को समर्पित कवितायें जो हमें प्राप्त हुईं, अभी तक न पढ़ी हों तो आप यहां पढ़ सकते हैं।  चाहें तो अपनी कविता भी भेज सकते हैं।

 

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मंगलवार, 17 नवंबर 2009

"जो कुछ करते नहीं वो मर जाते हैं" - विश्वविख्यात कत्थक नृत्यांगना एवं विश्व की सबसे छोटी आयु की योगाचार्या - प्रतिष्ठा शर्मा

"जो कुछ करते नहीं वो मर जाते हैं"  विश्व की सबसे छोटी आयु की योगाचार्या एवं विश्वविख्यात कत्थक नृत्यांगना प्रतिष्ठा शर्मा के मनोरंजक संस्मरण जो वह खाड़ी देशों की यात्रा से लौट कर आपके साथ बांट रही हैं।  www.thesaharanpur.com/gulf.html

 

"सहारनपुर की धरती पर पांच सौ कलाकार अपने कैनवस और तूलिका के साथ अपनी कल्पनाओं को रंग भरने में जुटे।"  - सृजन २००९ फोटो गैलरी में मिलिये इन बाल एवं युवा कलाकारों से।  www.thesaharanpur.com/drawingcomp.html

 

 

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

जिसे वन्दे मातरम्‌ गाना होगा, अवश्य गायेगा - फतवा हो या न हो !

इस्लामिक नेताओं द्वारा वन्दे मातरम्‌ के विरोध के विरोध में अनेकों स्तर पर क्षोभ व रोष का प्रदर्शन हुआ है।  दारुल उलूम देवबन्द द्वारा वन्देमातरम्‌ गायन हेतु मुसलमानों को अनुमति दे दिये जाने के समाचार से देश वासियों ने राहत की सांस ली ही थी कि अगले ही दिन दारुल उलूम के वन्दे मातरम्‌ विरोधी बयान फिर आ जाने से यह स्पष्ट हो गया कि कट्टरपंथी ताकतें सिर्फ पाकिस्तान सरकार पर ही हावी नहीं हैं, बल्कि दारुल उलूम देवबन्द भी इनका शिकार है।

इतिहास गवाह है कि इस्लामिक भावनाओं का सम्मान करते हुए वन्दे मातरम्‌ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करते समय उसमें केवल वे ही दो पद आधिकारिक रूप से स्वीकार किये गये थे जिनमें किसी भी प्रकार से मुस्लिम विरोध की भावना की कोई गुंजाइश नहीं थी।  पर अगर विरोध करने के लिये विरोध करना ही लक्ष्य हो तो एक कारण न रहे तो न सहीदूसरा कारण ढूंढ लिया जायेगा। यही वन्दे मातरम्‌ के साथ हो रहा है।  वन्दे मातरम्‌ का विरोध करने वाले कतिपय मुस्लिम मजहबी नेता व राजनीतिज्ञ सिर्फ अखबारों व टी.वी. चैनल पर अपने नाम और चेहरे देखने के लालच में ऐसे अतिवादी बयान और फतवे दिया करते हैं और यह आभास देते हैं कि उनके फतवों का उनके अनुयायी आदर-सम्मान करते हैं।  जब कि सच यह है कि इस्लामिक मजहबी नेताओं को राजनीतिज्ञ लोग तो सिर्फ इस लिये लिफ्ट देते हैं कि शायद उनके समर्थन और सहयोग से कुछ मुस्लिम वोट पक्के हो जायेंगे।  मीडिया इस लिये उनकी बातों को लेकर सुर्खियां बनाता है कि इससे सनसनी पैदा होगी और अखबार बिकेगा, टी.आर.पी. रेटिंग ऊंची जायेगी ।  पर जहां तक आम मुसलमान का सवाल हैअब उसकी मानसिकता बदल गई है।  वह देख रहा है कि समर्थ को कोई दोष नहीं लगता ।  सानिया मिर्ज़ा द्वारा टेनिस खेलते हुए जो मिनी स्कर्ट पहनी जाती है उसका विरोध किया गया पर जब सानिया ने एक नहीं सुनी तो चुप होकर बैठ गये।  ए. आर. रहमान ने वन्दे मातरम्‌ गीत का न केवल शानदार संगीत तैयार किया, अपितु इस अत्यन्त लोकप्रिय गीत को अपनी मधुर आवाज़ भी दी।  ए.आर. रहमान का इन फतवा - विशेषज्ञों ने क्या बिगाड़ लिया ए.आर. रहमान से पहले भी मुहम्मद रफी जैसे महान गायक हुए जिनके गाये भजन आज तक कानों में गूंजते रहते हैं।  न जाने कितने मुस्लिम अभिनेता - अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने हिन्दू किरदार निभाते हुए हर वह रस्म निभाई जो शरियत में मना होगी। सिंदूर भी लगायाबिछुए, कंगन, मंगलसूत्र भी पहने और मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना भी की।  किसने उनका क्या बिगाड़ लिया ?  

 

सच तो यह है कि अपने अनुयायियों को भेड़- बकरियों की तरह हांकने की इन फतवेदारों की मनोवृत्ति को उनके खुद के अनुयायी पहचान रहे हैं।  गणित और विज्ञान की शिक्षा का विरोध करके इन मजहबी नेताओं ने स्वयं ही बता दिया है कि वह किस अंधे कुएं में बैठे हैं और बाहर निकलने को राजी नहीं हैं। इन मजहबी और राजनीतिक नेताओं के पीछे चलते चलते मुसलमान प्रगति की दौड़ में पिछड़ता चला गया है क्योंकि इन नेताओं की दिलचस्पी वास्तव में केवल अपनी दुकान चलाने में है।  और यह दुकान तब तक ही चलती है जब तक ऐसा आभास बना रहे कि आम मुसलमान उनकी बात सुनता और मानता है।  

 

प्राचीन भारत में ऋषि मुनि कभी कभी नाराज़ होकर श्राप दे दिया करते थे। नाराज़ होने वालों में दुर्वासा ऋषि का नाम सबसे प्रमुख है।  यह श्राप भी एक प्रकार का फतवा ही था जो ऋषि-मुनियों की नैतिक सत्ता के कारण प्रभावी होता था।  राजा-महाराजा इस श्राप को लागू करने में उनकी मदद किया करते थे।  गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या का परित्याग किया तो किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि गौतम ऋषि के आदेश का विरोध कर सके।  पर दशरथ पुत्र राम ने गौतम ऋषि के श्राप की रत्ती भर परवाह न करते हुए मां अहिल्या के न केवल दर्शन किये बल्कि उनके पुनर्वास का भी दायित्व उठाया।  यह एक नैतिक सत्ता को दूसरी नैतिक सत्ता द्वारा चुनौती देने का अन्यतम उदाहरण है। 

 

आधुनिक युग में भी देखें तो न्यायालय के फैसले तब तक ही सम्मान्य होते हैं जब तक वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के अनुकूल होंदेश व समाज के हित साधक हों।  माननीय उच्चतम न्यायालय के अनेकानेक फैसले ऐसे हैं जिनको कांग्रेस सरकार ने कभी भी अहमियत नहीं दी, उनको लागू कराने की कभी कोई चेष्टा नहीं की गई क्योंकि विधायिका का दृष्टिकोण न्यायपालिका के दृष्टिकोण से जुदा था।  कई बार इन फैसलों को नकारने के लिये कानून में ही परिवर्तन कर दिया गया और कई बार सिर्फ अनसुना कर दिया गया।  ऐसे में न्याय पालिका ने भी अपने फैसलों के सम्मान की रक्षार्थ "सुझाव" शब्द का उपयोग करना आरंभ कर दिया। 

 

वास्तविकता के धरातल पर तो ऐसा पहले ही हो चुका है कि फतवे एक सुझाव से अधिक महत्व के नहीं रह गये हैं।  फतवों का कितना महत्व होगा, यह सीधे-सीधे इस बात पर निर्भर करता है कि वह फतवा एक आम समझदार नागरिक की बुद्धि में फिट बैठता है या नहीं।  यदि कोई मजहबी नेता मुसलमानों को यह आज्ञा दे कि गणित और विज्ञान पढ़ाना बन्द करो, डायनिंग टेबिल पर बैठ कर खाना मत खाओ, टीवी मत देखो, मोबाइल मत प्रयोग करो तो भला ऐसे फतवों का क्या हश्र होगा ?   यदि एक आम मुसलमान को लगता है कि ए.आर. रहमान ने वन्दे मातरम्‌ गाया और जन-जन का खूब प्यार और सम्मान अर्जित किया तो एक आम मुसलमान भी वन्दे मातरम्‌ गाने से क्यों परहेज़ करने लगा जिसका मन चाहेगा, वन्दे मातरम्‌ गायेगा, खूब गायेगा, डंके की चोट पर गायेगा - वन्दे मातरम्‌ गाने वाले किसी भी मुसलमान का कम से कम भारत में तो ये फतवा विशेषज्ञ कुछ बिगाड़ नहीं पायेंगे।

 


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सोमवार, 2 नवंबर 2009

लेती नहीं दवाई अम्मा, जोड़े पाई-पाई अम्मा ।

हमारे सहारनपुर के गौरव, हम सब के दुलारे कवि और मेरे प्रिय सखा श्री योगेश छिब्बर ने अपनी नवीनतम रचना मुझे एस.एम.एस. द्वारा भेजी है -

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा ।

(पूरी ग़ज़ल यहां उपलब्ध है)http://www.thesaharanpur.com/amma.html प्रो. छिब्बर का और अधिक परिचय - http://www.thesaharanpur.com/chhibber.html लिंक पर उपलब्ध है।

प्रो. छिब्बर ने आह्वान किया कि मैं भी अपनी अम्मा के प्रति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देते हुए कुछ पंक्तियां लिखूं और इस ग़ज़ल को आगे बढ़ाऊं । गीत, कवितायें और ग़ज़ल लिखना अपने बूते की बात नहीं पर घोर आश्चर्य ! जब अपनी अम्मा की छवि सामने रख कर गुनगुनाना शुरु किया तो कुछ पंक्तियां कागज़ पर उतर आईं।

आप भी तो अपनी अम्मा के बारे में कुछ कोमल भावनायें अपने हृदय में रखते होंगे / रखती होंगी ? अपनी अम्मा की छवि दस मिनट अपनी आंखों में बसा कर फिर इस गज़ल को गुनगुनाते हुए इसे और आगे बढ़ायें। यह हम सब बच्चों की ओर से हमारी प्यारी अम्मा को समर्पण होगा । ध्यान रखें, यह कोई गीत-गज़ल प्रतियोगिता नहीं हो रही है, जो भी लिखें, जैसा भी लिख पायें, २, ४ या ६ जितनी भी पंक्ति लिखें, अवश्य ही लिखें और हमें प्रेषित कर दें। आपकी पंक्तियां आपके नाम से उक्त पृष्ठ पर जुड़ती चली जायेंगी । प्यार और श्रद्धा से परिपूरित

सादर, सस्नेह,

आपका ही,

सुशान्त सिंहल
संस्थापक एवं संपादक
www.thesaharanpur.com
www.sushantsinghal.blogspot.com
email : info@thesaharanpur.com

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

हिन्दी में एक नई वेबसाइट का आगमन

मित्रों,
बहुत समय से ब्लॉग की तरफ ध्यान नहीं दे पा रहा हूं। आपके ब्लॉग पढ़ता हूं पर लिखने का समय नहीं निकाल पा रहा। आप सोच रहे होंगे कि ऐसी भी मुई क्या व्यस्तता हो गई ! सच तो ये है कि मेरे शहर सहारनपुर सी एक ऐसी वेबसाइट बनाने का विचार मार्च २००९ में मन में आया जिसमें वह सब कुछ हो जो सहारनपुर के बारे में दुनिया जानना चाह सकती है और जो सहारनपुर वासी अपने बारे में दुनिया को बताना चाहेंगे। साइट हिन्दी व अंग्रेज़ी में द्विभाषी बनाने की इच्छा थी। प्रोजेक्ट की विशालता को देखते हुए और अपने सीमित संसाधनों को देखते हुए ब्लॉग में समय लगाने के बजाय मैने इस वेबसाइट पर ध्यान केन्द्रित किया। मुझे लगा कि सहारनपुर से उच्च-शिक्षा के लिये, जॉब के लिये या विवाह आदि अन्य कारणों से हर साल हज़ारों युवक-युवतियां बाहर चले जाते हैं। सहारनपुर के बारे में जानते रहने की, सहारनपुर से जुड़े रहने की उनकी इच्छा कभी उनको ओर्कुट पर ले जाती है तो कभी फेस बुक पर । सहारनपुर के लिये वे कुछ करना भी चाहते हैं पर दिशा नहीं मिलती। ऐसे सभी युवाओं के लिये भी, जो देश के विभिन्न हिस्सों में (खासकर बंगलुरु, नॉएडा, गुड़गांव, दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद) या अमेरिका, इंग्लैंड आदि देशों में रह रहे हैं - यह वेबसाइट एक ऐसा मंच बन जाये जिसमें उनको यहां के समाचार कम से कम साप्ताहिक रूप से तो मिलते ही रहें। बस, यही सब सोच कर एक वेबसाइट बना डाली है http://www.thesaharanpur.com/ कभी अवसर मिले तो देखिये और सुझाव भी दीजिये कि इसमें और क्या - क्या दिया जा सकता है, इसे खूबसूरत व आकर्षक बनाने के लिये क्या - क्या किया जाना चाहिये - आदि।
आपका ही अभिन्न,
सुशान्त सिंहल

गुरुवार, 19 मार्च 2009

आवश्यकता है ५४२ नालायकों की - कठोर टिप्पणी हेतु साधुवाद

मेरी पोस्ट "आवश्यकता है ५४२ नालायकों की" पर किन्हीं  BS की टिप्पणी के लिये उनका हार्दिक धन्यवाद।   इस प्रकार की पोस्ट पर एक रूढ़ि के रूप में, वाहवाही कर देने से बात वहीं की वहीं समाप्त हो जाती है जबकि विषय की गंभीरता मांग करती है कि इन प्रश्नों को मथा जाये।  आपने बहस चलानी चाहीइसके लिये आपको साधुवाद

बी एस ने जिन बिन्दुओं को अपनी टिप्पणी में स्पर्श किया है, उनसे मेरी असहमति नहीं है।  मैं राज्य सभा का जिक्र नहीं कर रहा हूं।  राज्य सभा और लोक सभा की चयन प्रक्रिया बिल्कुल अलग है।  मेरा प्रयास सिर्फ हमारे संविधान की उन खामियों की ओर इंगित करना है जिनके चलते हमारे सांसदों की हर अगली पीढ़ी पहले वाली पीढ़ी की तुलना में निकृष्ट होती चली गयी है।  

क्या ये सच नहीं है कि -

 -    हमारे संविधान में सांसद या विधायक पद हेतु चुनाव लड़ने के लिये जो अर्हतायें निर्धारित की गयी हैं उनसे कहीं अधिक अर्हतायें किसी विद्यालय में चपरासी बनने के लिये निर्धारित होती हैं?   हमारे देश के संविधान के प्रावधानों के अनुसार जो व्यक्ति स्कूल में चपरासी बनने के अयोग्य है, वह शिक्षा मंत्री बन सकता है और शिक्षा मंत्री बन कर उसी विद्यालय के वार्षिकोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में भाषण देने लगता है, विद्यालय के प्रधानाचार्य उसको माल्यार्पण करके स्वयं को धन्य हो गया मानने लगते हैं।  जो व्यक्ति सिपाही बनने के लिये भी अयोग्य है, उसे हमारा संविधान परेड की सलामी लेने योग्य बना देता है, उसे प्रतिरक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभालने के योग्य मान लिया गया है।  क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं? 

-   लालू प्रसाद यादव को बिहार का मुख्य मंत्री पद छोड़ कर जेल जाना पड़ा तो अपना राज-पाट अपनी लगभग निरक्षर पत्नी को सौंप गये।  मुख्य मंत्री के पद पर देश ने एक ऐसी महिला को विराजमान देखा जो चूल्हे-चौके के अलावा कुछ जानती ही नहीं थी। क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं? 

-   अपने लिये कानून स्वयं बना लेनाजब उच्चतम न्यायालय आपकी किसी हरकत को असंवैधानिक ठहराये तो उससे बच निकलने के लिये देश के कानून में ही परिवर्तन कर देना  हमारे देश में बड़ी आसानी से देखने को मिलता रहता है। क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं? 

     अपना वेतन और भत्ते खुद तय करना; जब चाहो, जितनी चाहो, उनमें वृद्धि कर लेना हमारे लोकतंत्र में अनुमन्य है । क्या ये किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हो सकते हैं? 

     आप पढ़े लिखे हैं, विद्वान हैंविभिन्न राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों का मनन करके, सभी प्रत्याशियों की कुंडली जांच कर वोट दे कर आते हैं, वहीं दूसरि ओर, आपके पड़ोस का कोई व्यक्ति देसी ठर्रे के एक पाउच के लालच में, या जात-बिरादरी के कहने पर एक गलत व्यक्ति को वोट दे आता है और इस प्रकार आपके वोट की महत्ता को समाप्त कर देता है - क्या ऐसी व्यवस्था के अंतर्गत आप श्रेष्ठ जन-प्रतिनिधियों की उम्मीद कर सकते हैंक्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं         

     एक पांचवी पास दुकानदार, जो कल तक अपने मुहल्ले की दुकान पर कपड़ा बेच रहा था, आज हमारे लोकतंत्र की लायकी की वज़ह से विधायक और फिर मंत्री बन जाता है और एक आइ..एस. उसका सचिव बन कर उसके मातहत कार्य करने लगता है।  अब आप कल्पना कीजिये - इन तथाकथित 'माननीय' मंत्री महोदय को किसी भी शासकीय कार्य का कोई तज़ुर्बा नहीं है, कोई ट्रेनिंग की भी आवश्यकता नहीं समझी गयी है।  मंत्री पद इस लिये मिल गया क्योंकि उनकी जाति को प्रतिनिधित्व दिया जाना जरूरी लगा ।  क्या ये 'माननीय' मंत्री जी उस आइ..एस. सचिव के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ हो सकते हैं 

     स्थानीय स्तर पर देखें तो पंचायतों मे, नगर-पालिकाओं में महिलाओं के लिये सुरक्षित सीटों पर जो महिला प्रत्याशी चुनाव लड़ती हैं - वह केवल डमी होती हैं - चुनाव उनके पति लड़ते हैं, वही भाषण भी देते हैं, जन संपर्क आदि करते हैं ।  यदि कोई मुस्लिम महिला उम्मीदवार हो तो पोस्टरों पर फोटो भी उसके पति का ही देखा जाता है।  चुनाव जीत जायें तो सारा राजकाज उनके पति ही चलाते हैं।  बैठकों में महिला सभासद या प्रधान नहीं, प्रधान पति बैठते हैं और हम हैं कि इन संविधानेत्तर सत्ता केंद्रों को खड़े करके प्रसन्न हैं - इस खुशफहमी में जी रहे हैं कि हमने महिलाओं को सत्ता सौंप दी, जबकि ये महिलायें अपने पति के आदेश पर, न जाने किन-किन कागज़ों पर अंगूठा भर लगाती हैं।  हम इसे लोकतंत्र मान बैठे हैं और खुश हैं।   होते रहिये आप खुश, मेरी दृष्टि में तो  यह संविधान के हास्यास्पद प्रावधानों के निकृष्टतम उदाहरण हैं ।  

     बी एस ने अपनी टिप्पणी में जिस लायब्रेरी का जिक्र किया हैयदि वर्तमान व्यवस्था इसी प्रकार चलती रही तो ये लायब्रेरी धूल फांकेंगी। बाहुबलियों के इस युग में लायब्रेरी का क्या कामअब बुद्धिबल की नहीं, बाहुबल की, जातिबल की, धनबल की आवश्यकता का जमाना आ चुका है।  

     अब रहा सवाल कि मैंने लोकतन्त्र के लिये क्या किया है तो मैं विनम्रता पूर्वक यही कह सकता हूं कि देश की जनता को संविधान की इन कमियों के प्रति सतर्क करना, उनमे परिवर्तन की आकांक्षा जगाना, इसके लिये जनमत निर्माण का सतत प्रयास करना भी लोकतंत्र की छोटी सी सेवा ही तो है।  जैसी देशघाती व्यवस्था हमारे देश में चल रही है, वह हमारे वर्तमान जन-प्रतिनिधियों को बहुत रास आ रही है।  वह उसमे कोई परिवर्तन नहीं चाहते हैं ।  यदि चुनाव आयोग या हमारे माननीय सभापति महोदय चुनाव प्रक्रिया में सुधार की कोई अकांक्षा रखते हैं तो ऐसी हर पहल को तारपीडो कर देना, उसके मार्ग में यथा-संभव रोड़े अटकाना, उसमें से चोर दरवाज़े ढूंढ कर अपनी हरकतों को जारी रखने में ही उनका स्वार्थ निहित है ।  ऐसे में यह कार्य आपको और हमें ही करना होगा।  

            कुछ उपायों की ओर इंगित किया जा सकता है जिनको अपना कर हम कुछ बेहतरी की आशा कर सकते हैं।  मेरी तुच्छ बुद्धि में भी दो चार बातें आ रही हैं। 

     एक आई. . एस. बनने के लिये कठिनतम बौद्धिक परीक्षाओं से गुज़रना होता है। एक जिलाधिकारी बनना किसी भी युवा का सपना हो सकता है।  एक आइ. . एस. की तुलना में निपट मूर्ख, निरक्षर भट्टाचार्य जन-प्रतिनिधि उसकी छाती पर मंत्री बन कर बैठ जाता है, उसको उल्टे-सीधे आदेश देता है, न माने तो उसका ट्रांसफर कर देने के अधिकार रखता है - क्या ये किसी लायक लोकतंत्र के लक्षण हैंक्या बॉस को कम से कम अपने सचिव जितना शिक्षित होना अनिवार्य नहीं होना चाहियेयदि ऐसी व्यवस्था कर दी जाये कि एम.पी. या एम.एल.. का चुनाव वही व्यक्ति लड़ सकता है जो आइ..एस. की प्रिलिमिनरी परीक्षा पास कर चुका हो तो क्या चुनाव लड़ने के इच्छुक टिकटार्थियों की संख्या में पर्याप्त कमी नहीं दिखाई देगीक्या हमारे जन-प्रतिनिधियों के बौद्धिक स्तर में गुणात्मक परिवर्तन दिखाई नहीं देंगे 

            आज हम स. मनमोहन सिंह का इतना सम्मान क्यों करते हैंवह एक लब्धप्रतिष्ठ अर्थशास्त्री हैं, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रह चुके हैं, देश की अर्थव्यवस्था की बारीकियों को भली प्रकार समझ सकते हैं - उनका आइ..एस. सचिव उनके सिर पर सवार नहीं हो सकता क्योंकि उसे पता है कि उसका बॉस उससे अधिक विद्वान यदि न भी होगा तो उसके जितना तो विद्वान है ही । 

            आप कोई भी सरकारी नौकरी के लिये आवेदन करें तो आपकी स्वास्थ्य परीक्षा होती है। (स्वास्थ्य परीक्षा सेना में भर्ती के लिये ही नहीं, सरकार के सभी विभागों में सेवा  पाने के लिये अनिवार्य है।परंतु हमारे लायक लोकतंत्र में चुनाव लड़ने के लिये, एम.पी., एम.एल.. बनने के लिये, मंत्री बनने के लिये बीमार होना कहीं आड़े नहीं आता।  फल यह है कि चुनाव जीतते ही, हमारे जन-प्रतिनिधि सरकारी खर्च पर ऑपरेशन कराने के लिये अमेरिका या इंग्लैंड भागते हैं और देशवासियों की खून-पसीने की कमाई से बटोरे गये टैक्स इस प्रकार इन लोगों  पर लुटाये जाते हैं।  क्या इसमें कुछ बुराई है कि चुनाव लड़ने के इच्छुक व्यक्ति को कठिन स्वास्थ्य परीक्षा से गुज़ारा जाये और जो इस परीक्षा में असफल हों वह अपने घर बैठ कर अपना इलाज़ करायें 

            आम लोक सेवकों की भांति जन-प्रतिनिधियों की भी सेवा-निवृत्ति की आयु तय की जाये इसमें क्या बुराई हो सकती है 

     अभी कुछ वर्ष पूर्व कानून में संशोधन कर के यह प्रावधान कर दिया गया कि सदन पांच वर्ष तक चले या न चले, सांसदों, विधायकों की पेंशन तो पक्की हो ही जायेगी। आजकल देख रहा हूं कि हिंदुस्तान समाचार पत्र में हमारे देश के सभी सांसदों की सक्रियता (परफॉर्मेंस) से संबंधित बहुत महत्वपूर्ण व रोचक जानकारी पाठकों तक क्रमिक रूप से पहुंचायी जा रही है जिसे देख कर स्पष्ट है कि हमारे अधिकांश सांसद या तो सदन से अनुपस्थित रहते रहे हैं, या फिर सदन में उपस्थित रह कर भी ऊंघते रहे हैं।  क्या इसमे कुछ बुराई है कि पेंशन की राशि तय करने के लिये नये सिरे से पैरामीटर बनाये जायें और यह परफोरमेंस (performance based)  पर आधारित हो 

     उपाय तो बहुत हो सकते हैं, चुनाव आयोग भी इस विषय में चिन्तित है।  यह भी तय है कि हमारे जन-प्रतिनिधि ऐसे हर किसी प्रयास का पुरजोर विरोध करेंगे।  आखिर ये उनकी रोज़ी-रोटी से जुड़ा सवाल है!!  वे भला क्यों चाहने लगे कि उनकी गर्दन पर आरी चले? पर बंधु, लोकतंत्र केवल उसी समाज में सफल होता है जहां 'लोक' जागृत हो, 'तंत्र' में जो दोष दिखें, उनको दूर करते रहने की मानसिक तैयारी हो। हम भारतीय तो राजतंत्र के अभ्यस्त हैं। जो एम.एल../एम.पी बन जाता है, उसको अपने मुहल्ले में बुला कर उसका अभिनन्दन करने की होड़ में लग जाते हैं - अपना काम निकलवाने के लिये उसके कृपा-पात्र बनना चाहते हैं।   यदि हमें पता है कि वह व्यक्ति अनाचारी, दुराचारी है, जेल भी काट आया है तो भी उसको घर बुला कर उसका आतिथ्य करने में सौभाग्य मानते हैं।  अभिनन्दन करते समय यह नहीं सोचते कि आखिर ये व्यक्ति अभी चुना ही तो गया है, पांच साल काम कर ले, उसके बाद देखेंगे कि अभिनंदन करना है या गधे की सवारी करानी है।  

बुधवार, 18 मार्च 2009

आवश्यकता है ५४२ नालायकों की !

देश को ५४२ नालायकों की तुरंत आवश्यकता है।  चयन होते ही आने वाली सात पीढ़ियों तक का जुगाड़ होने की पूरी गारंटी है। वेतन पर कोई आयकर नहींजब मर्ज़ी, जितना मरज़ी वेतन स्वयं बढ़ा लेने की सुविधा उपलब्ध है। काम की कोई जिम्मेदारी नहीं है।  ऑफिस में आओ, या न आओ, आपकी इच्छा पर निर्भर करेगा।  शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है, अंगूठा छाप भी चलेगा।  रिश्वत लेने देने की पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी इस बारे में विशेषाधिकार आपकी रक्षा करेगा ।

 एकमात्र अनिवार्य अर्हता है - जनता को अपनी लच्छेदार बातों से, धन बल से, बाहु बल से - येन-केन प्रकारेण बहला कर, फुसला कर, आतंकित करके, प्रताड़ित करके, बूथ लूट कर, घपलेबाजी करकेयानि किसी भी प्रकार से वोट हासिल करने होंगे।  यदि आप हत्या, बलात्कार आदि-आदि किसी जुर्म में जेल की सज़ा काट रहे हैं तो भी कोई विशेष दिक्कत नहीं है - आप अपने गुर्गों की सहायता से चयन प्रकिया में भाग ले सकेंगे।  

चयनित व्यक्ति का मुख्य कार्य भाषण देना, सार्वजनिक अभिनंदन कराना, मालायें पहनना, जब तब विदेश यात्रा करना, लोगों के अंट-शंट काम निपटाने में उनकी मदद करना आदि रहेंगे। आदर्शवादी आवेदन करने की चेष्टा / धृष्टता न करें, उनका आवेदन पत्र प्रथम दृष्टया निरस्त कर दिया जायेगा।  

इच्छुक व्यक्ति २०-३० लाख रुपये पार्टी चंदे के रूप में जेब में डाल कर लाइन में लग जायें।       

मंगलवार, 10 मार्च 2009

सहारनपुर में पुष्प प्रदर्शनी

होली की मस्ती

 

 

Sushant K. Singhal

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प्लीज़ ! मुझसे भी रंग लगवालो न !

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होली है भई होली है !

सभी मित्रों को होली की रंग - बिरंगी शुभकामनायें !

           

            रूठों को गले लगाने को,

            बिछुड़ों को पास बुलाने को,

            गुंझिया और भुजिया खाने को,

            आती घर-घर होली है !

 

आपका ही,

 

सुशान्त सिंहल

 

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शनिवार, 7 मार्च 2009

मांसाहार और मानव

उक्त विषय पर चल रहे विमर्श में दो एक बातें और जोड़ना चाहूंगा ।  इन बिंदुओं को भाई सलीम ने अपने विद्वतापूर्ण आलेखों में (www.swachchsandesh.blogspot.com) बार-बार छुआ है अतः इस बारे में भ्रम निवारण हो जाये तो बेहतर ही होगा !

 भाई सलीम का मानना है कि ईश्वर ने मनुष्यों को जिस प्रकार के दांत दिये हैं वह मांसाहार के लिये उपयुक्त हैंयदि मांसाहार मनुष्य के लिये जायज़ न होता तो मनुष्यों को नुकीले दांत क्यों दिये जाते।

 सलीम के इस तर्क को पढ़ने के बाद मैने अपने और अपने निकट मौजूद सभी लोगों के दांत चेक किये।  मुझे एक भी व्यक्ति का जबाड़ा कुत्ते, बिल्ली या शेर जैसा नहीं मिला । जो दो-तीन दांत कुछ नुकीले पाये वह तो रोटी काटने के लिये भी जरूरी हैं।  यदि मनुष्य के दांतों में उतना नुकीलापन भी न रहे फिर तो वह सिर्फ दाल पियेगा या हलुआ खायेगा, रोटी चबानी तो उसके बस की बात रहेगी नहीं। 

 यदि यह चेक करना हो कि हमारे दांत मांस खाने के लिये बने हैं या नहीं तो हमें बेल्ट, पर्स या जूते चबा कर देखने चाहियें ।  कम से कम मेरे या मेरे मित्रों, पड़ोसियों के, सहकर्मियों के दांत तो इतने नुकीले नहीं हैं कि चमड़ा चीर-फाड़ सकें।  हमारे नाखून भी ऐसे नहीं हैं कि हम किसी पशु का शिकार कर सकें, उसका पेट फाड़ सकें। 

 यदि प्रकृति ने हमारे शरीर की संरचना मांसाहार के हिसाब से की है तो फिर हमारे दांत व हमारे पंजे इस योग्य होने चाहियें थे कि हम किसी पशु को पकड़ कर उसे वहीं अपने हाथों से, दांतों से चीर फाड़ सकते।  यदि चाकू-छूरी से काट कर, प्रेशर कुकर में तीन सीटी मार कर, आग पर भून कर, पका कर, घी- नमक, मिर्च का तड़का मार कर खाया तो फिर हम मनुष्य के दांतों का, पाचन संस्थान का त्रुटिपूर्ण हवाला क्यों दे रहे हैं?

 पाचन संस्थान की बात चल निकली है तो इतना बता दूं कि सभी शाकाहारी जीवों में छोटी आंत, मांसाहारी जीवों की तुलना में कहीं अधिक लंबी होती है।  हम मानव भी इसका अपवाद नहीं हैं। जैसा कि हम सब जानते ही हैं, हमारी छोटी आंत लगभग २७ फीट लंबी है और यही स्थिति बाकी सब शाकाहारी जीवों की भी है।  शेर की, कुत्ते की, बिल्ली की छोटी आंत बहुत छोटी है क्योंकि ये मूलतः मांसाहारी जानवर हैं।

 वैसे भी हमारा पाचन संस्थान इस योग्य नहीं है कि हम कच्चा मांस किसी प्रकार से चबा भी लें तो हज़म कर सकें।  कुछ विशेष लोग यदि ऐसा कर पा रहे हैं तो उनको हार्दिक बधाई।

 सुशान्त सिंहल

 

दैनिक अमर उजाला को हार्दिक धन्यवाद !

समाचार पत्र खुद अपनी ओर से आपके लेखन को नोटिस करें और प्रकाशित करने लगें तो निश्चय ही अच्छा लगता है। पिछले सप्ताह ही मेरे एक मित्र ने मुझे बधाई दी कि दैनिक अमर उजाला ने मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित पोस्ट को जस-का-तस प्रकाशित कर दिया है। मैने तारीख जाननी चाही तो वह बोला - लगभग दस दिन पहले! मैं एक पब्लिक लायब्रेरी में गया जिसमें मैं पहले कभी नहीं गया था, बेतरतीब ढंग से पड़े अखवारों के ढेर में से अमर उजाला ढूंढे। जब खोज अन्ततः सफल हुई तो वहां व्यवस्थापक महोदय से प्रार्थना की कि उस पृष्ठ को ले जाने की अनुमति दें। उन्होंने कारण पूछा तो उस पृष्ठ पर प्रकाशित अपनी पोस्ट उनको दिखाई। पूरा आलेख पढ़ने के बाद उन्होंने बधाई दी और अखवार ले जाने की सहर्ष अनुमति दे दी!

 

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गुरुवार, 5 मार्च 2009

मांसाहार नहीं, शाकाहार स्वास्थ्यकर है।

मांसाहार या शाकाहारबहस बहुत उपयोगी है और मनोरंजक भीमैं स्वयं पूर्णतः शाकाहारी हूं पर मेरे विचार में मैं शाकाहारी इसलिये हूं क्योंकि मेरा जन्म एक शाकाहारी माता-पिता के घर में हुआ और मुझे बचपन से यह संस्कार मिले कि शाकाहार मांसाहार की तुलना में बेहतर है।  आज मैं स्वेच्छा से शाकाहारी हूं और मांसाहारी होने की कल्पना भी नहीं कर पाता हूं। 

 मुझे जिन कारणों से शाकाहार बेहतर लगता है, वह निम्न हैं:-

 .     मैने विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते पढ़ा है कि ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत सूर्य है। पेड़-पौधे फोटो-सिंथेसिस के माध्यम से अपना भोजन बना सकते हैं पर जीव-जंतु नहीं बना सकते। ऐसे में वनस्पति से भोजन प्राप्त कर के हम प्रथम श्रेणी की ऊर्जा प्राप्त कर लेते हैं।

 .   दुनिया के जिन हिस्सों में वनस्पति कठिनाई से उत्पन्न होती है - विशेषकर रेगिस्तानी इलाकों में, वहां मांसाहार का प्रचलन अधिक होना स्वाभाविक ही है।

 .   आयुर्वेद जो मॉडर्न मॅडिसिन की तुलना में कई हज़ार वर्ष पुराना आयुर्विज्ञान है - कहता है कि विद्यार्थी जीवन में सात्विक भोजन करना चाहिये।  सात्विक भोजन में रोटी, दाल, सब्ज़ी, दूध, दही आदि आते हैं।  गृहस्थ जीवन में राजसिक भोजन उचित है।  इसमें गरिष्ठ पदार्थ - पूड़ी, कचौड़ी, मिष्ठान्न, छप्पन भोग आदि आते हैं।  सैनिकों के लिये तामसिक भोजन की अनुमति दी गई है।  मांसाहार को तामसिक भोजन में शामिल किया गया है। राजसिक भोजन यदि बासी हो गया हो तो वह भी तामसिक प्रभाव वाला हो जाता है, ऐसा आयुर्वेद का कथन है। 

             भोजन के इस वर्गीकरण का आधार यह बताया गया है कि हर प्रकार के भोजन से हमारे भीतर अलग - अलग प्रकार की मनोवृत्ति जन्म लेती है।  जिस व्यक्ति को मुख्यतः बौद्धिक कार्य करना है, उसके लिये सात्विक भोजन सर्वश्रेष्ठ है।  सैनिक को मुख्यतः कठोर जीवन जीना है और बॉस के आदेशों का पालन करना होता है। यदि 'फायर' कह दिया तो फयर करना है, अपनी विवेक बुद्धि से, उचित अनुचित के फेर में नहीं पड़ना है।  ऐसी मनोवृत्ति तामसिक भोजन से पनपती है, ऐसा आयुर्वेद का मत है।

      यदि आप कहना चाहें कि इस वर्गीकरण का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है तो मैं यही कह सकता हूं कि बेचारी मॉडर्न मॅडिसिन अभी प्रोटीन - कार्बोहाइड्रेट - वसा से आगे नहीं बढ़ी है।  जिस दिन भोजन व मानसिकता का अन्तर्सम्बन्ध जानने का प्रयास करेगी, इस तथ्य को ऐसे ही समझ जायेगी जैसे आयुर्वेद व योग के अन्य सिद्धान्तों को समझती जा रही है।  तब तक आप चाहे तो प्रतीक्षा कर लें, चाहे तो आयुर्वेद के सिद्धान्तों की खिल्ली भी उड़ा सकते हैं।

             जब हम मांसाहार लेते हैं तो वास्तव में पशुओं में कंसंट्रेटेड फॉर्म में मौजूद वानस्पतिक ऊर्जा को ही प्राप्त करते हैं क्योंकि इन पशुओं में भी तो भोजन वनस्पतियों से ही आया है।  हां, इतना अवश्य है कि पशुओं के शरीर से प्राप्त होने वाली वानस्पतिक ऊर्जा सेकेंड हैंड ऊर्जा है।

      यदि आप मांसाहारी पशुओं को खाकर ऊर्जा प्राप्त करते हैं तो आप थर्ड हैंड ऊर्जा पाने की चेष्टा करते हैं। वनस्पति से शाकाहारी पशु मेंशाकाहारी पशु से मांसाहारी पशु में और फिर मांसाहारी पशु से आप में ऊर्जा पहुंचती है।  हो सकता है कि कुछ लोग गिद्ध, बाज, गरुड़ आदि को खाकर ऊर्जा प्राप्त करना चाहें।  जैसी उनकी इच्छावे पूर्ण स्वतंत्र हैं।

             एक तर्क यह दिया गया है कि पेड़-पौधों को भी कष्ट होता है।  ऐसे में पशुओं को कष्ट पहुंचाने की बात स्वयमेव निरस्त हो जाती है।  इस बारे में विनम्र निवेदन है कि हम पेड़ से फल तोड़ते हैं तो पेड़ की हत्या नहीं कर देते। फल तोड़ने के बाद भी पेड़ स्वस्थ है, प्राणवान है, और फल देता रहेगा।  आप गाय, भैंस, बकरी का दूध दुहते हैं तो ये पशु न तो मर जाते हैं और न ही दूध दुहने से बीमार हो जाते हैं।  दूध को तो प्रकृति ने बनाया ही भोजन के रूप में है।  पर अगर हम किसी पशु के जीवन का अन्त कर देते हैं तो अनेकों धर्मों में इसको बुरा माना गया है।  आप इससे सहमत हों या न हों, आपकी मर्ज़ी।

             चिकित्सा वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि प्रत्येक शरीर जीवित कोशिकाओं से मिल कर बनता है और शरीर में जब भोजन पहुंचता है तो ये सब कोशिकायें अपना-अपना भोजन प्राप्त करती हैं व मल त्याग करती हैं।  यह मल एक निश्चित अंतराल पर शरीर बाहर फेंकता रहता है। यदि किसी जीव की हत्या कर दी जाये तो उसके शरीर की कोशिकायें मृत शरीर में मौजूद नौरिश्मेंट को प्राप्त करके यथासंभव जीवित रहने का प्रयास करती रहती हैं।  यह कुछ ऐसा ही है कि जैसे किसी बंद कमरे में पांच-सात व्यक्ति ऑक्सीजन न मिल पाने के कारण मर जायें तो उस कमरे में ऑक्सीजन का प्रतिशत शून्य मिलेगा।  जितनी भी ऑक्सीजन कमरे में थी, उस सब का उपभोग हो जाने के बाद ही, एक-एक व्यक्ति मरना शुरु होगा।  इसी प्रकार शरीर से काट कर अलग कर दिये गये अंग में जितना भी नौरिश्मेंट मौजूद होगा, वह सब कोशिकायें प्राप्त करती रहेंगि और जब सिर्फ मल ही शेष बच रहेगा तो कोशिकायें धीरे धीरे मरती चली जायेंगी।  ऐसे में कहा जा सकता है कि मृत पशु से नौरिश्मेंट पाने के प्रयास में हम वास्तव में मल खा रहे होते हैं।  हो सकता है, यह बात कुछ लोगों को अरुचिकर लगे।  मैं उन सब से हाथ जोड़ कर क्षमाप्रार्थना करता हूं। पर जो बायोलोजिकल तथ्य हैं, वही बयान कर रहा हूं। 

             भारत जैसे देश में, जहां मानव के लिये भी स्वास्थ्य-सेवायें व स्वास्थ्यकर, पोषक भोजन दुर्लभ हैं, पशुओं के स्वास्थ्य की, उनके लिये पोषक व स्वास्थ्यकर भोजन की चिन्ता कौन करेगा?   घोर अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में रहते हुए, जहां जो भी, जैसा भी, सड़ा-गला मिल गया, खाकर बेचारे पशु अपना पेट पालते हैं।  उनमें से अधिकांश घनघोर बीमारियों से ग्रस्त हैं।  ऐसे बीमार पशुओं को भोजन के रूप में प्रयोग करने की तो कल्पना भी मुझे कंपकंपी उत्पन्न कर देती है।  यदि आप फिर भी उनको भोजन के रूप में बड़े चाव से देख पाते हैं तो ऐसा भोजन आपको मुबारक।  हम तो पेड़ - पौधों पर छिड़के जाने वाले कीटनाशकों से ही निबट लें तो ही खैर मना लेंगे ।

 उक्त विवेचन में यदि किसी भी व्यक्ति को कुछ अरुचिकर अनुभव हुआ हो तो मुझे हार्दिक खेद है।

 

सुशान्त सिंहल

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फोटोग्राफी क्लासरूम - प्रथम प्रश्नपत्र !

मित्रों

 

जो आज तक बताया, वह सब याद है न? गुड चलो चेक कर लेते हैं।  आशा है, आप निम्न प्रश्नों का सही उत्तर लिख भेजेंगे ताकि मुझे यह विश्वास हो सके कि मैं अपना कार्य सफलता पूर्वक कर पा रहा हूं. यदि आप सब विशेष योग्यता के साथ पास हो गये तो एक प्रशिक्षक के रूप में मेरी हिम्मत बहुत बढ़ जायेगी और मैं दूने जोश खरोश के साथ आपकी सेवा में लग सकूंगा ।

 

तो ये रहा पहला प्रश्नपत्र -

 

कुछ फिक्स्ड फोकस कैमरों के निर्माताओं का नाम व कैमरों का मॉडल बतायें.  Name some models of fixed focus cameras.

 

लेंस की रिज़ॉल्विंग पॉवर से क्या तात्पर्य है? आप इसे कैसे चेक करेंगे?  What do you understand by the term - RESOLVING POWER OF A LENS ?  How do you check it as a camera buyer ?

 

यदि कोई डिजिटल कैमरा पूर्ण अंधकार में भी फोटो खींच लेता है तो वह ऐसा क्यों कर पा रहा हैIf a camera is taking photograph in complete darkness,  how is it able to do so?  What is causing the exposure on the CCD / Film ? 

 

लेंस के डायमीटर और कैमरे के मेगा पिक्सल में ज्यादा किसका महत्व है और क्यों?  Which is more important ?  Dia. of the front element of a lens or the number of mega pixals?  Can you explain why?

 

६ एम.एम. फोकल लेंग्थ की लेंस वाइड / नॉर्मल / टेली में से कौन सी मानी जायेगी?   What is a 6 mm. focal length lens ?   Wide / normal or tele ?

 

एफ़ ४ और एफ़ ११ में किसमें अधिक प्रकाश फिल्म तक पहुंचता है?  Which setting will ensure more light to the film  - f 4 or f 11 ?

 

एपर्चर बदलने से फिल्म पर पहुंचने वाले प्रकाश की मात्रा को कम या अधिक किया जा सकता है - यह आपको बताया गया है।  क्या एपर्चर बदलने से इसके अलावा आपकी फोटो में कुछ और भी अन्तर आता है?  (यह बोनस प्रश्न है - इसका उत्तर देने वाले शिक्षार्थी को क्लास का मॉनीटर नियुक्त किया जायेगा !!!!)  Controlling aperture controls the exposure.  What else it affects on? 

 

आपके पास कौन सा कैमरा है, इसका परिचय दें।  अपनी खींची हुई दो-दो फोटो भी मुझे मेल करें।   Please tell me about your camera.  You are requested to send me 1 or 2 photographs for evaluating your skills with your camera.  Please send it at info@sushantsinghal.com  or singhal.sushant@gmail.com

 

सुशान्त सिंहल

  

पुनश्चःआप्को सही उत्तर ध्यान न आये तो पुरानी पोस्ट का अध्ययन कर लें।  जितने भी श्रेष्ठ विश्वविद्यालय हैं, सब यह अनुमति दे देते हैं। 

 

 Sushant K. Singhal

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फोटोग्राफी क्लासरूम - चार एक्सपोज़र मोड (Learn Photography - The Four Exposure Modes on Camera)

अब आपको ये तो स्पष्ट हो ही चुका होगा कि फिल्म / सी.सी.डी. को कितना एक्सपोज़र मिलेगा यह चार तत्वों पर निर्भर करता है। ये चार तत्व हैं:

  - प्रकाश कितना है? How much is the intensity of light ? (धूप है या छाया है? / बल्ब १०० वाट का है या १००० वाट का?) 

 एपर्चर कितना खोला गया है?  What is the aperture setting ?  (लेंस का एपर्चर जितना अधिक खुला होगा उतना ही अधिक प्रकाश फिल्म पर पहुंचेगा। )

 शटर स्पीड कितनी रखी गयी है? What shutter speed has been chosen ? (जितने अधिक समय तक शटर खुला रहेगा, फिल्म पर उतना ही अधिक प्रकाश पहुंचेगा।)

 फिल्म कितने ASA की है?  What is the ASA/ ISO rating of the film?   (जितनी फास्ट फिल्म होगी, उतनी ही जल्दी एक्सपोज़ होगी।)

 अब कल्पना करें कि:

             आप दिन में ताजमहल की फोटो खींचना चाहते हैं।  इसका मतलब प्रकाश तो जितना है सो हैआप शाम होने की या सूर्य के आगे बादल आने की प्रतीक्षा करें तो बात अलग है अन्यथा हम प्रकाश की मात्रा को अपरिवर्तनीय मान कर चल सकते हैं।

             आपने कैमरे में 100 ASA  की फिल्म डाली हुई है।  अब फिल्म भी जो है सो है - यह भी अपरिवर्तनीय मान लें।  (मानता हूं कि डिजिटल कैमरे में आप ASA रेटिंग कम ज्यादा कर सकते हैं - कल ही तो आपको बताया है, पर कुछ समय के लिये मान लीजिये कि ऐसा कुछ नहीं है)

             अब आपके पास दो फैक्टर बच गये - एपर्चर और शटर स्पीड aperture and shutter speed   अब सुनिये काम की बात।  जरा ध्यान से सुनियेगा !

            कैमरे में मुख्यतः चार प्रकार की सेटिंग्स हो सकती हैं  Cameras may have basically four types of exposure settings :-

             . मैनुअल MANUAL (This is shown as M ) (इसमें शटर स्पीड और एपर्चर - दोनो आप ही सेट करते हैं ।  यदि आपके कैमरे में इलेक्ट्रॉनिक एक्स्पोज़र मीटर exposure meter लगा हुआ हो तो भी, वह सिर्फ इंडिकेशन दे सकता है कि वर्तमान शटर/एपर्चर ठीक हैं या कम ज्यादा हैं परंतु कैमरा उनमे से किसी को भी स्वयं नहीं बदल सकता ।  Even if there is an exposure meter in your camera, in MANUAL mode,  camera can merely indicate whether the exposure is correct or not. 

             . एपर्चर को प्राथमिकता APERTURE PRIORITY (This is shown as A or Av - Aperture /  Aperture value - इस सेटिंग में आप एपर्चर स्वयं तय करेंगे और आप द्वारा तय की गई एपर्चर सेटिंग व उपलब्ध प्रकाश के हिसाब से शटर स्पीड कैमरा स्वयं तय करेगा। In Aperture Priority mode, the camera permits you to choose an aperture ( f stop) of your choice.  Depending upon the amount of light available, the camera will try to select the optimum shutter speed for you.)

             . शटर स्पीड को प्राथमिकता - SHUTTER PRIORITY (This is shown as S or Tv - Shutter /  Time value  इस सेटिंग पर आप अपने कैमरे में शटर स्पीड खुद सेट करते हैं ।  उसके बाद उपलब्ध प्रकाश के हिसाब से एपर्चर कितना खोला जाये, यह कैमरा खुद तय करता है। In SHUTTER PRIORITY mode, the camera permits you to choose a shutter speed (Time Value).  Depending upon the amount of light available, the camera will try to select the optimum aperture for you.)

             All the above three modes are also referred to as CREATIVE ZONE because these modes leave the expert photographers a choice to prove their creativity.

             . प्रोग्राम ऑटो या फुल ऑटो PROGRAMMED AUTO (Indicated as P ) or FULL AUTO (Indicated usually as a green or red coloured Camera icon) - इन सेटिंग्स पर कैमरा उपलब्ध प्रकाश के हिसाब से शटर व एपर्चर स्वयं ही तय करता है।  आज कल के हाई-फाई इलेक्टॉनिक कैमरों में इस ऑटो मोड में भी, और आगे बढ़ते हुएढेरों ऑप्शन देने लगे हैं - जैसे - पोर्ट्रेट मोड, लैंडस्केप मोड, नाइट मोड आदि-आदि।  कैमरा निर्माताओं का कहना है कि उन्होने कैमरे के अंदर कम्प्यूटर फिट किया है व हज़ारों चित्रों का डाटाबेस भी भर रखा है।  जब आप कैमरा किसी की ओर तानते हैं तो आपका ये कम्प्यूटरीकृत कैमरा सामने दिखाई देने वाले सीन को अपने डाटाबेस में उपलब्ध चित्रों से मैच करता है तथा जिस पिक्चर से मैच हो जाये, उसकी सेटिंग्स प्रभावी कर देता है। वल्लाह ! क्या बात है!  In either of these two settings, camera takes care of shutter / aperture settings itself.  Camera is reported to have a computerised database consisting of thousands of ideal pictures taken in variety of situations.  When you aim your camera towards someone/something, the camera tries to match your scene with the existing photographs in the available database and selects the best settings for you!  Isn't it GREAT ! 

             अब मित्रों, ये आप खुद देखें कि आपके पास जो कैमरा है उस कैमरे में कौन कौन से मोड उपलब्ध हैं।  कैमरों में ऊपर की ओर एक गोल डायल होता है जिस पर M, S, A, P  or  M, Av, Tv, P अक्षर लिखे होते हैं।  एक हरे रंग का कैमरा भी बना रहता है जो ऑटो मोड का सूचक है।

             जब मैने फोटोग्राफी सीखी थी तो मेरे पास फिल्म वाला Asahi Pentax MX मैनुअल कैमरा हुआ करता था जिसमे सिर्फ मैनुअल मोड था। एपर्चर व शटर दोनो ही मुझे स्वयं तय करने होते थे।  एक्स्पोज़र मीटर मुझे सिर्फ गाइड करता था। लगभग दस वर्षों तक मैने उसी कैमरे से प्यार किया ।  जिस किसी के पास मैं शटर / एपर्चर प्रायोरिटी / ऑटो कैमरे देखता था तो ठंडी आहें भरता था ।  ज़ूम लेंस भी नहीं थी पर उस समय भी कुछ चित्र ऐसे खींचे गये जो मुझे बहुत प्रिय हैं व जिनको बहुत पसंद किया गया।   आज मेरे पास जो भी कैमरे हैं उन सब में चारों एक्सपोज़र मोड उपलब्ध हैं।  परन्तु ऑटो का लाभ मुझे सिर्फ वहां दिखाई देता है जहां त्वरित गति से फोटो खींचनी हों और बड़ी तेज़ी से प्रकाश कम ज्यादा हो रहा हो।  यदि आप बार-बार शटर-एपर्चर नहीं बदल सकते तो ऐसी परिस्थितियों में ऑटो मोड निश्चय ही सुविधा जनक है। 

             यदि आपके पास डिजिटल कैमरा है तो या तो उसमे सिर्फ ऑटो मोड होगा या फिर चारों मोड होंगे।  ऐसा कोई डिजिटल मॉडल मैने तो नहीं देखा है जिसमें ऑटो व मैनुअल मोड हों, परंतु शटर प्रायोरिटी व एपर्चर प्रायोरिटी मोड न हों।

             बाकी बात कल को होगी। तब तक के लिये अपने इस मित्र को विदा दें।  नमस्कारम् !

 आपका ही,

 सुशान्त सिंहल