बुधवार, 31 दिसंबर 2008

पक्षकार को न्याय दीजिये ।

पक्षकार को न्याय दीजिये ।

 

 

एक वकील का धर्म क्या हैअपने मुवक्किल को येन-केन-प्रकारेण जिताने का प्रयास करनाया, उसे न्याय दिलाना?   यह एक विडम्बना ही है कि हमारे देश में अपने मुवक्किल को हर प्रकार के छल प्रपंच करते हुए जिताने की चेष्टा करना  वकील का धर्म माना जाने लगा है।  इसके लिये पक्षकार, उसके गवाह और उसका वकील - हर कोई खुले आम झूठ बोलने में संकोच नहीं करते ।  अत्यन्त चिंतनीय तो ये है कि "सच बोलने और सच के सिवा कुछ नहीं बोलने" की शपथ लेने के बावजूद झूठ बोला जा रहा है और हमारी न्यायपालिका झूठी गवाही देने वालों को दंडित करती भी दिखाई नहीं देतीं।  यही कारण है कि हमारे देश में न्यायालयों में मुकद्दमों की अंतहीन कतार दिखाई दे रही है।  झूठा मुकद्दमा करने और झूठी गवाही देने पर यदि कठोर दंड मिलने लगे तो लाखों पक्षकार और उनके वकील भागते नज़र आयेंगे।  अपने विरोधी को परेशान करने की नीयत से उस पर झूठा मुकद्दमा करना और उसे सालों-साल कचहरी और वकीलों के चक्कर काटने के लिये मज़बूर करना हमारे देश में आम बात हो गई है।  अक्सर लोग धमकी देते दिखाई देते हैं - "साले, चार-पांच मुकद्दमें ठोक दूंगा।  वकीलों के चक्कर काटते काटते ऊम्र गुज़र जायेगी पर मुकद्दमें खत्म नहीं होंगे!" 

 

स्पष्ट ही है कि न्यायपालिका में दूसरी समस्या मुकद्दमों का कई- कई साल तक चलते रहना है।   यदि यह सिद्धान्त वास्तव में सही है कि न्याय देने में विलंब करना अन्याय करने के समकक्ष है तो, न्यायपालिका के प्रति पूर्ण आदर रखते हुए भी यह कहना पड़ता है कि हमारे देश में न्यायपालिका अन्याय करने की दोषी है।   मुकद्दमा जितना लंबा खिंचे, उतनी ही वकीलों की चांदी हैऐसे में वकीलों का हित व पक्षकारों का हित परस्पर विरोधी हैं।   हां अगर पक्षकार भी झूठा हो तो उसका हित भी मुकद्दमा अधिकतम समय तक अनिर्णित रहने में ही है।   ऐसे में दुःखद निष्कर्ष यही निकालना पड़ता है कि फैसला प्रदान करने में देरी करके न्यायपालिका झूठे मुकद्दमों व ऐसे मुकद्दमें करने वाले वकीलों को जानते- बूझते प्रोत्साहित करने की दोषी है।  झूठे बयान, झूठी गवाही और झूठे शपथपत्रों पर कठोरतम कार्यवाही न करना व ऐसे अपराधियों के प्रति बार-बार नरमी दिखाना इस दुःखद निष्कर्ष की पुष्टि ही करता है।   न्यायपालिका द्वारा यह तर्क देना कि झूठे गवाहों के विरुद्ध मुकद्दमें इस लिये नहीं किये जाते क्योंकि न्यायालयों में पहले ही  बहुत अधिक मुकद्दमें हैं - वास्तव में सफेद झूठ है।   दस - पांच लोगों को झूठी गवाही के लिये कठोरतम दंड देकर तो देखिये।  लाखों मुकद्दमों में न्यायालय के बाहर ही समझौते हो जायेंगे और वाद निर्णय हेतु न्यायालय में प्रार्थनापत्र आ जायेंगे।  पर अगर ऐसा होने लगे तो वकीलों की आमदनी खतरे में आ जायेगीबार ऐसोसियेशन हड़ताल का आह्वान कर देंगी। 

 

निष्कर्ष रूप मेंयदि हमें मुकद्दमों का फैसला जल्दी चाहिये तो निम्न पग उठाये जाने लाभकर हो सकते हैं :-

 

-     झूठे मुकद्दमों, झूठे बयान, झूठी गवाही और झूठे शपथपत्रों पर कठोरतम कार्यवाही।

-    इस सिद्धांत का प्रतिपादन कि वकील का धर्म अपने मुवक्किल को न्याय दिलाना है न कि झूठी गवाहियों के सहारे उसे जिताने का प्रयास करना।  इसका सीधा सा अर्थ यह है कि यदि पक्षकार दोषी है तो उसकी सजा कम कराने की कोशिश की जा सकती है किन्तु कानूनी दांव-पेंच के सहारे उसे निर्दोष साबित कराने की चेष्टा न तो न्याय के हित में है और न ही समाज के हित में है।  "Guilty or Not Guilty?"  आरोपी से सबसे पहला प्रश्न यही होना चाहिये।   आरोपी अपना अपराध स्वीकार कर ले तो उन हालातों पर गौर करते हुए, जिनमें अपराध हुआ - सज़ा की मात्रा का निर्णय हो।  आरोपी स्वयं को निर्दोष बताये तो अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किये गये सबूतों की अत्यन्त सावधानी से जांच-पड़ताल होनी चाहिये और आरोपी को हर संभव मदद न्यायालय की ओर से मिलनी चाहिये ताकि वह अपनी निर्दोषिता साबित कर सके ।  अंततः अपराध साबित हो तो कठोरतम दंड और निर्दोष सिद्ध हो तो सरकार निर्दोष को अकारण प्रताड़ित करने के लिये उसे हर्जाना दे। 

-   दीवानी मुकद्दमों में न्यायालयों व वकीलों को फीस मुकद्दमें का निपटारा होने के बाद मिलनी चाहिये ताकि मुकद्दमों का शीघ्र निपटारा होने में ही उनका हित साधन हो।  यह फीस हारने वाले पक्ष से वसूल की जानी चाहिये।  यह सिद्धान्त तय होना चाहिये कि न्यायालय की सेवाओं के लिये निर्धारित शुल्क देकर न्याय खरीदने वाला पक्षकार एक उपभोक्ता है तथा अग्रिम शुल्क लेकर भी कई दशक तक न्याय न दिया जाना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत सेवा में कमी (Deficiency in Services) माना जायेगा।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

Can I do something for others in 2009 ?

A friend recently asked me what I was going to do for others in the coming year?   This gave me a chance to look within myself.   Here is the result:

 

People in this world can be put into different categories:      

 

1.   Even though it doesn't do any good for them, they enjoy hurting others.

 

2.   If their interests are served even remotely,  they are ready to hurt others. 

 

3.   Some people worry about their own interests but take care not to hurt others' interests. 

 

4.   Many people serve their interests in such a way that others are also benefitted.

 

5.   Some people would do something for others as far as their own interests are not hurt.

 

6.   Very rarely,  we find people who would  do such things for others' sake which are detrimental to their own interests.   

 

As far as I am concerned,  I would like to belong to 5th category but shall be happy even if I can manage to remain at 4th stage.

 

Now the question arises, what will I do to fulfil above conditons?

 

I read somewhere the following and was greatly inspired by it:

 

"We have not inherited this Earth from our ancestors.  We have borrowed it from our future generations.  Therefore,  let's strive for better environment. We owe it to our children."   

 

Thinking of ways to and doing whatever little I can to improve the habitat for coming generations is my hobby. 

Secondly,  trying to improve the next generation by offering them better education is my livelihood.  

 

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

Pratap Market, Saharanpur and the Local Police Administration

Do you hold the view that police doesn't have cooperative attitude towards the public? 
Think again. If you still insist, come to Pratap Market, Saharanpur. It is a living testimony of the utmost cooperation the police offers to the shopkeepers who decide to encroach on the road as far as they dare to.

A few years before, a hesitant person decided to start a business of sale-purchase of motorbikes in this market. Being a prudent businessman, he knew very well how to handle the local administration including the police officers. Seeing his business flourishing, other people decided to switch to the same business. Since these people don't have enough space in their shops to accommodate hundreds of motor-bikes, they feel free to use the road to park the vehicles even if it means taking up half of the width of the road for the purpose.  Quite strangely, they also manage to get utmost cooperation from the Nagar Palika, Saharanpur and the police.  (People say that the Nagar Palika and police staff comes weekly to these businessmen to sell their cooperation to these people.

So, we now have several shops buying and selling hundreds of second-hand motorbikes every week within a span of 200 meters in Pratap Market, Saharanpur. The road was recently widened and built again. Some people had hoped that after complete repair of the road, these people would be asked to learn to behave and to stop encroaching the road.  But no !  Cooperation towards encroachment is far more important than public convenience.   

One cynic passerby commented that some stolen bikes also find place in this market and as such police has a commercial interest in keeping this market going.  I don't believe this.  What do you think about it?  

A MUST READ STORY- काँच की बरनी और दो कप चाय-

 

 

काँच की बरनी और दो कप चाय एक बोध कथा
जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है,सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, 'काँच की बरनी और दो कप चाय' हमें याद आती है
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...
उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की  बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु कियेh धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई  है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया
इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो....
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं,
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और
रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..
अब यदि तुमने काँच की बरनी में  सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर सकती थी...
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है अपने  बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक- अप करवाओ...टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे.. अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि 'चाय के दो कप' क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच  ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया...
इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये  



 

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The Criminal Nagar Palika, Saharanpur


Saharanpur is a city, a district head quarter and also a commissionery head quarter.  As if it were not enough, it holds the distinction of being the constituency of BSP supremo, Chief Minister Ms. Mayawati too.   At the business front, it is the home of exquisitely hand carved sheesham wood handicrafts inviting hundreds of foreign buyers every year.  Saharanpur is also a big wholesale market for cloth catering to the merchants of bordering states of Uttarakhand, Haryana and Himachal Pradesh.   Quite impressed, huh ?


 

 Saharanpur has also earned the dubious distinction of being inhabited by people who are hopelessly in love with filth, garbage and excreta.   When Saharanpur Nagar Palika,  having elected representatives of such people,  decided to set up Garbage Collection Centres in the busy streets and markets of the town,  naturally everyone rejoiced.   They were specially pleased with the fact that these Garbage Collection Centres were not going to have any pick-up containers (large dustbins) to hold the shit and the entire shit was to be spread on the roads itself.   Being quite tender-hearted towards the animals, they were perhaps happy because spreading the shit on the road would allow stray dogs and pigs to feed themselves as and when they were hungry. 

 So, now we have truck loads of excreta and other rubbish arriving from different colonies of the town.  The different varieties are thoroughly mixed and then spread on the road.  As to which roads would get the great opportunity to have this shit,  the lucky draw winners were our Ansari Road and Bomanji Road.  The residents of these roads consider them extremely lucky.  Why shouldn't they be ?   Now they and their children can enjoy the stench of faeces 24 x 7.  

 The Director - Health, the Commissioner, the C.M.O., the District Magistrate, The City Magistrate, the M.L.As,  the Executive Officer, Nagar Palika, the Sanitary Inspectors, the Municipal Commissioners, local medical practitioners, the Principals and teachers of various schools and colleges,  the IIA chairman and members, the Vyapar Mandal Chairman and all members,  all NGOs, clubs and societies, local scribes, residents, students, shopkeepers, customers  -- everyone has chosen to maintain studied silence over it.  Perhaps everyone else is right and I am wrong - the odd man out who is trying to wake up all these people. 

 Sushant Singhal

info@sushantsinghal.com; singhal.sushant@gmail.com

 

 

 

सोमवार, 15 सितंबर 2008

Reservation according to size of population ? Never.

Deciding percentage of quota in jobs and higher education seats on the basis of size of population of a particular community is equal to rewarding the culprits.   For decades, our nation has been advocating the ideal of a small family and most of the highly educated families have accepted this ideal by limiting the size of their family.  

Now we can find only one or two children in lacs of families in India.   On the other hand,  there are a huge number of families in our country where the ideal of having as many children as biologically feasible is still an ideal.  Some times, it is owing to illiteracy, sometimes it is for social, religious or political reasons.  In democracy, where head-count is the method of deciding as to who would rule the nation,  it is only natural for various religious, social, ethnic groups to think of steadily increasing their population so as to favourably influence the outcome of elections.  It is long-term politics to have as much children as your reproductive system would permit.  

In the above background,  granting these groups special quota in jobs and higher education seats according to size of their population is encouraging them to increase their population further.   Not only this, in the name of social justice, it is gross injustice to those communities who are following the ideal of 'one or two kids only'.    Due to the fact that  they have only one or two kids to look after, they are able to spend higher part of their income on their children's education.  On the other hand, a couple with same level of income but having 10 to 12 children to rear, cannot obviously spend the same amount of money on each child.  

I fully agree that children of so called higher castes are not genetically better or more intelligent than the children of socially backward classes but they are seen to perform better only because their parents are able to spend higher on their education etc. 

Our political leaders are generally believed to pursue only those policies that would further their political ambitions.  If our political class considers this belief to be baseless, based on prejudice and an injustice to them, they should add the following exclusions in the reservation policy formulated by them :

1. A maximum of two children can avail benefit of the reserved quota in a family eligible for the reservation benefits.  Thus, Lalu Prasad Yadav and Rabri Devi can avail quota benefit for only two of their 11 children.

2. If either of the parents is or has ever been MLA, MLC or M.P. the children are outside the purview of the reserved quota.

3. If either of the parents is/has been a Gazetted Officer / Class I officer, their children cannot claim jobs/seats under reserved catagory.

4. If either of the parents has a pucca built house in his or her name in any town or city having population of 1 lakh or above, the children cannot claim reserved quota.

5. If either of the parents has a car or similar four wheeler in his or her name,  their children cannot claim reserved quota benefits.

6. If either of the parents has served a jail sentence owing to a crime of moral turpitude,  they cannot claim quota benefits for their children.

7. A candidate would be eligible for reserved quota only once in his / her student life and only once while seeking a job.   

8.                  Reserving seats for promotions in jobs is an insult to intelligence hence is discontinued henceforth.

If these exclusions are put into effect,  these would help only those who are in real need of such measures.  If you feel that the above proposal meets the demands of social justice to everyone concerned,  please circulate this message as widely as possible to build public opinion in favour of it.